Umanath Tripathi
बेमानी रिश्ते दोहे
चोर उचक्के आ मिले, लगा रहे हैं घात । बचकर इनसे हम रहें, कब करें प्रतिघात ॥ कदम कदम पर है ठगी, घर हो या बाजार ।जाये तो जाये कहाँ, लूट लूट अरु मार ॥ सगे पराये कुछ नही, सबकी एक ही सोच ।मौक़ा पायें जब कभी, खाल लेत हैं नोंच ॥मन में तो कटुता … Read more
गरीब की दीवाली
कच्ची माटी के दिये, बेंच रहा कुम्हार । मोलभाव की रार से, बेचारा लाचार ॥ भाव लगाते मूर्ति का, जिसको पूजे आप ।ईष्ट का सौदा करें, पुण्य मिला या पाप ॥होटल बिल भुगतान में, कभी न देखते बिल । करता माँग गरीब है, टूट जाता है दिल ॥ ग़रीब की तो ज़िन्दगी, होती एक अभिशाप … Read more
लौट जा तू माँ गंगे
एक महीप धरा पर लायादूजा तट है बांध रहा पाप तारिणी मोक्षदायिनी हे माँ !! यही तेरा सत्कार रहा ।शहर शहर के गंदे नाले माँ तेरी आँचल में गिरते हैं कितना कृतघ्न हुआ यह मानव उपकार का यह प्रतिकार रहा ।नदी नहीं संस्कार है गंगा शिव जी का श्रृंगार है गंगा विष्णु का चरणोदक हैकितना … Read more
नीतिगत दोहे
सच से करता प्रश्न हूँ, बैठे क्यों हो मौन। हंसकर बोला प्रेम से, सुनता सच है कौन ॥सरल स्वभाव है भला, होता ये संस्कार । निर्बल उसे न समझिये, जिसका हृदय उदार ॥झुकना अच्छी बात है, देती इक पहचान।स्वाभिमान के मोल पर, होत नही सम्मान।।मिट जाती हैं दूरियां, रख वाणी पर मौन । विनम्रता का … Read more
पाखंड दोहे
वाणी से वक्ता बड़ा, दूजे को दे ज्ञान । स्वयं ढोल का पोल है , छद्म रूप पहचान ॥धोखा ही सब ओर है, घर हो या बाज़ार ।सतर्कता बरतें सदा, मत हो कभी शिकार ॥मिथ्यावादी सब हुये, लुप्त हुये आचार । धर्म कर्म सब त्याग कर, कर रहे अनाचार । ठेका हो हर काम का, … Read more
पत्नी का साथ दोहे
देता हूँ एक मशविरा, सुन लो कान लगाय । पत्नी यदि नाराज़ है, पंगा मत लो भाय ॥ गृह कलह मत बढ़ाइये, मन में रहे सुकून । शांति से जीवन कटे, पा रोटी दो जून ॥कुछ समय भी निकालिए, बैठिये पत्नी पास ।इधर उधर मत नाचिए, पत्नी मन हो हुलास ॥ हाथ बंटा लो किचन … Read more
हे माँ तेरी ममता कहाँ गयी
हे माँ, तेरी ममता कहाँ गईमुझे प्यार क्यों नहीं करती कितनी पत्थर दिल की हो मेरी पीड़ा को नहीं समझती हे माँ, तेरी ममता कहाँ गई▪️मैं तेरा बच्चा हूँ, तेरा खून हूँतेरी कोख से जन्मा हूँफिर क्यों मुझे तपाती हो धूप मेंबिन कारण पीटती हो ▪️मैं तेरा अरमान हूँ, तेरा सपना हूँतेरी खुशी का सबब … Read more
धरती की वेदना
धरती हूँ , धारण करती हूँ, पालती हूँ पोसती हूँ इसलिए तो धरती माँ कहलाती हूँ पर अब थक गयी हूँ , अपनों के ही पाप ढोते ढोते, छोड़ गये राजा परीक्षित भी मुझे असहायकलि के प्रकोपों को झेलने के लिए ।गौ रूप में भी सुरक्षित नहीं सरेआम कटती हूँ, किससे कहूँ अपनी वेदना गौ … Read more