पाखंड दोहे

वाणी से वक्ता बड़ा, दूजे को दे ज्ञान ।

स्वयं ढोल का पोल है , छद्म रूप पहचान ॥

धोखा ही सब ओर है, घर हो या बाज़ार ।

सतर्कता बरतें सदा, मत हो कभी शिकार ॥

मिथ्यावादी सब हुये, लुप्त हुये आचार ।

धर्म कर्म सब त्याग कर, कर रहे अनाचार ।

ठेका हो हर काम का, पूजा हो या श्राद्ध ।

पंडा की बन आयी है, बिक जाता प्रसाद ॥

दर्शन पर भी शुल्क है, जगह जगह के भाव ।

जितना भारी चढ़ावा, वैसा दर्शन पाव ॥

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