कैसे भूलें माँ बाप के उपकार को छंद मुक्त

कैसे भूलें माँ–बाप के उपकार कोमाँ तो माँ ही होती है,कैसे भूलें उसके उपकार को,जिसके आँचल में सिमट जाता हैपूरा का पूरा संसार।नौ महीने पीड़ा सहकरजो जीवन को धरती पर ले आती हैकैसे भूलें उसके उपकार को।रात–रात भर जागती है,अपनी नींद कुर्बान कर देती है,बच्चे की एक मुस्कान परअपने सारे दुख भुला देती है।पालना–पोषण में … Read more

रिश्ते मुक्तक

रिश्ते आईना होते हैं, सच दिखा जाते हैं,कभी हँसाते हैं दिल को, कभी रुला जाते हैं।जो सह ले उनकी खामोशी, जो समझ ले उनका दर्द,वही लोग रिश्तों को उम्र भर निभा जाते हैं।हर रिश्ते में शब्द नहीं, भावों की भाषा होती है,कभी मौन की चोट गहरी, कभी मीठी आशा होती है।जो पढ़ ले आँखों की … Read more

ऐसा दोस्त कहां से लाऊँ

ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँथक कर जब मैं रुक सा जाऊँ,राहें भी अनजानी लगें,बिना कहे जो हाथ बढ़ाए,दौड़ के मुझसे आ गले लगें।हर ख़ामोशी पढ़ ले मेरी,हर डर को जो समझ जाए,ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँकृष्ण–सुदामा जैसी डोरी,आज कहाँ वो रीत निभाए,सादा दिल, सच्चा रिश्ता,जो हर हाल में साथ निभाए।नाम नहीं, … Read more

आज के रिश्ते

पहले रिश्ते मन से जुड़े, अब मतलब से बँध जाते हैं,आत्मीयता की ऊष्मा खोकर, शब्द ही शेष रह जाते हैं।बड़ों की डाँट में स्नेह छुपा, अनुभव का था उजियारा,आज जवाब में उत्तर नहीं, बस अहंकार का गुब्बारा।जो बच्चे पलट कर बोल रहे, दोष उनका क्या माना जाए,जब माँ-बाप स्वयं आदर खो दें, संस्कार कहाँ से … Read more

ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ

ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ ✍️ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँऐसा मित्र कहाँ से लाऊँजो मेरा चावल खा जाएपाँव पखारे आँसुओं सेबिन माँगे सबकुछ दे जाएऐसा सखा कहाँ से पाऊँऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ॥पाँव के छाले देख-देख कर, अपने आँसू से पग धोता हो,कृष्ण-सा मुझ पर स्नेह लुटाए, मन की बात समझता हो।कृष्ण-सुदामा जैसी मैत्रीकहाँ भला … Read more

नन्हें मन के फूल

नन्हे मन के फूल तुम्हीं हो, मुस्कानों के धूल तुम्हीं हो।रंग–बिरंगी दुनिया अपनी, उसकी सबसे मूल तुम्हीं हो।नन्हे मन के फूल तुम्हीं होकूदो–फाँदो, खेलो–कूदो,आँगन को तुम रौशन कर दो।प्यारी-प्यारी हँसी तुम्हारी,सबका थका हुआ मन हर दो।तुमसे ही है घर में उजियारा,तुमसे खुशियों की धारनन्हे मन के फूल तुम्हीं होपुस्तक खोलो, ज्ञान सँजो लो,सपनों को ऊँचा … Read more

माना कि अब बड़े हो गये

माना कि हम बड़े हो गए,पर बचपन अभी तो ज़िन्दा है।सफ़ेद हुए इन बालों के पीछेएक नन्हा परिंदा ज़िन्दा है॥वो मिट्टी में खेलना अपना,वो पेड़ों पर चढ़ जाना;नदी किनारे कंकड़ चुनकरथैले में भर घर ले आना।गली-मोहल्ले में खेल-कूद,नंगे पाँव भाग निकल जानाधीमी हुई कदमों की रफ़्तार,पर मन की चाल अभी ज़िन्दा है।माना कि हम बड़े … Read more

बूढ़ी माँ का दर्द

कभी माँ के पास बैठकर पूछो बस इतना ही कहना, “थक गई हो क्या?” रात के ग्यारह बजे थे,सन्नाटा था, घर सोया था,बस रसोई से छन–छन की ध्वनि,कुछ कहती-सी, कुछ रोया था।कब सोती है, कब जगती है,किसी को नहीं है भान,दिन भर झाड़ू–पोछा करती,मां मशीन बनी न रही इंसान?नींद नहीं थी आँखों मेंजलते थे प्रश्न … Read more

बूढ़ी माँ का दर्द

बूढ़ी माँ का दर्द कभी माँ के पास बैठकर पूछो बस इतना ही कहना,“थक गई हो क्या?” 🌷रात के ग्यारह बजे थे,सन्नाटा था, घर सोया था,बस रसोई से छन–छन की ध्वनि,कुछ कहती-सी, कुछ रोया था।कब सोती है, कब जगती है,किसी को नहीं है भान,दिन भर झाड़ू–पोछा करती,मशीन है या है इंसान?नींद नहीं थी आँखों में,जलते … Read more

ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ

कहाँ कहाँ खोजूँ मैं उसको, किसके दरवाज़े पे जाऊँ,जो मेरे चावल खा जाए, ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ। जीवन की कठिन राहों में, दोस्त हज़ारों मिलते हैं,मतलब पूरा होने पर ही,रास्ते अपने बदल लेते हैंहरदम साथ निभाने वाला, साथी ढूँढ कहाँ से लाऊँ?जो मेरे चावल खा जाए,ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ। हार पक्की मालूम थी … Read more