धरती की वेदना

धरती हूँ , धारण करती हूँ,

पालती हूँ पोसती हूँ

इसलिए तो धरती माँ कहलाती हूँ

पर अब थक गयी हूँ ,

अपनों के ही पाप ढोते ढोते,

छोड़ गये राजा परीक्षित भी मुझे असहाय

कलि के प्रकोपों को झेलने के लिए ।

गौ रूप में भी सुरक्षित नहीं

सरेआम कटती हूँ,

किससे कहूँ अपनी वेदना

गौ चारे जल बिना मरती हूँ ।

अतिक्रमण, दोहन, प्रदूषण

छलनी कर रहे मेरे सीने को,

कट रहे हैं सब हरे भरे जंगल

स्वार्थ और विकास के नाम पर ।

जल दूषित, हवा दूषित

भोज्य पदार्थ सब दूषित हैं,

माँ गंगे का निर्मल जल भी

कचरे से है भरा हुआ ।

कहीं सूर्य ताप से तपती हूँ

कहीं इन्द्र के प्रकोप को झेलती हूँ

क्या दूँगी तुमको हे मानव

तुमसे ही तो मैं छलती हूँ ।

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