चोर उचक्के आ मिले, लगा रहे हैं घात ।
बचकर इनसे हम रहें, कब करें प्रतिघात ॥
कदम कदम पर है ठगी, घर हो या बाजार ।
जाये तो जाये कहाँ, लूट लूट अरु मार ॥
सगे पराये कुछ नही, सबकी एक ही सोच ।
मौक़ा पायें जब कभी, खाल लेत हैं नोंच ॥
मन में तो कटुता भरी, मीठा बोल न जाय ।
सम्मान की कौन कहे , घर से देय भगाय ।
चक्रव्यूह रचते वही, होते बहुत क़रीब ।
चुपके से वे दांव दें, मन से बहुत गरीब ॥
वाणी में कटुता भरी, छोटा बड़ा समान ।
संस्कार की है कमी, करते हैं अपमान ॥
पढ़े लिखे किसे कहे, सब मर्यादा हीन ।
रिश्ते बेमानी हुये, शर्म विधाता छीन ॥