बेमानी रिश्ते दोहे

चोर उचक्के आ मिले, लगा रहे हैं घात ।

बचकर इनसे हम रहें, कब करें प्रतिघात ॥

कदम कदम पर है ठगी, घर हो या बाजार ।

जाये तो जाये कहाँ, लूट लूट अरु मार ॥

सगे पराये कुछ नही, सबकी एक ही सोच ।

मौक़ा पायें जब कभी, खाल लेत हैं नोंच ॥

मन में तो कटुता भरी, मीठा बोल न जाय ।

सम्मान की कौन कहे , घर से देय भगाय ।

चक्रव्यूह रचते वही, होते बहुत क़रीब ।

चुपके से वे दांव दें, मन से बहुत गरीब ॥

वाणी में कटुता भरी, छोटा बड़ा समान ।

संस्कार की है कमी, करते हैं अपमान ॥

पढ़े लिखे किसे कहे, सब मर्यादा हीन ।

रिश्ते बेमानी हुये, शर्म विधाता छीन ॥

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