लौट जा तू माँ गंगे

एक महीप धरा पर लाया

दूजा तट है बांध रहा

पाप तारिणी मोक्षदायिनी

हे माँ !! यही तेरा सत्कार रहा ।

शहर शहर के गंदे नाले

माँ तेरी आँचल में गिरते हैं

कितना कृतघ्न हुआ यह मानव

उपकार का यह प्रतिकार रहा ।

नदी नहीं संस्कार है गंगा

शिव जी का श्रृंगार है गंगा

विष्णु का चरणोदक है

कितना अपकार हो रहा ।

सुर सरि तू कहलाती है

यहाँ नर्क है भोग रही

जिनको अपना बालक समझती

हे माँ ! वही तुझे दुत्कार रहा ।

इससे अच्छा स्वर्ग में रहती

प्रभु के श्री चरणों का वंदन करती

लौट जा तू माँ हे गंगे

अब यहाँ कोई भगीरथ न रहा ।

सगर के पुत्रों जैसे मानव

पड़े रहने दो कीट पतंगों जैसे

दया के पात्र नही है तेरे

स्वर्ग में न इनका स्थान रहा ।

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