Umanath Tripathi
गरीब की ज़िन्दगी
शीत उष्ण बरसात हो, झेल रहे दिन रात । खुले गगन के ही तले, कटे ठिठुरती रात ॥ छत विहीन ये ज़िन्दगी, होती बहुत दुरूह । सर्द ठिठुरती रात में , उड़ जाती है रूह ॥ जाये तो जाये कहाँ, है न कोई उपाय ।रोज़ी रोटी के लिये, जगह जगह भरमाय ॥ दर दर ठोकर … Read more
हौसला
मत हो निराश मेरे बच्चों ! जीवन पथ पर तुम्हें चलना है मिलेंगे काँटे जगह जगह, काँटों को साफ तुम्हें करना है ।कमजोर तुम्हारा वक्त है तुम नहीये वक्त भी गुज़र जायेगाखिलेंगे फिर फूल चमन में नया सवेरा फिर आयेगा, हिम्मत ही तेरा संबल हैहिम्मत ही होता आत्मबल है हिम्मत नहीं छोड़ना तुम विजय पताका … Read more
जीवन चक्र
बैठा हूँ बालकनी में,वृक्षों की शृंखला देख रहा हूँ,कल जो हरे भरे थे,आज ठूंठ जैसे दिख रहे हैं।जीवन की यात्रा में कई मोड़ आते हैं,कुछ खुशियाँ, कुछ गम के साथ जाते हैं,पत्तों की तरह हम भी गिरते हैं,पर नए जीवन की उम्मीद में फिर से उठते हैं।जैसे पत्ते गिरते हैं,वैसे ही जीवन की पल-पल बदलती … Read more
माँ कैकेयी
हे माते कैकेयी ! क्यों माँगा तूने दो वरदानकिसके लिए ??बेटे भरत के लिए लगता तो नही .राम को तो तू ज़्यादा चाहती थी प्राणों से भी अधिक ..मेरा राम मेरा राम दिन रात यही रटती थी मन नहीं मानता माँ क्यों नहीं खोला अपना मुँह चुप्पी साधे रही अपयश लिया, पति को खो दिया … Read more
ईश्वर एक विभेद क्यों
एक ही धरती, एक ही आकाश,एक ही सूर्य का प्रकाश,एक ही चंद्र, नभ में एक जैसे तारे,फिर ईश्वर क्यों अलग-अलग?एक ही वायु, एक ही प्रकृति,एक ही अग्नि, एक ही जल है,एक ही प्राण, एक ही प्राणदाता,फिर ईश्वर क्यों अलग-अलग?एक ही सृष्टि, एक रचयिता,एक ही पालनकर्ता, संहारक भी एक ही,सुख-दुख भी एक जैसे होते,खुशी और पीड़ा … Read more
ई सावन मह बुलाइ ला भइया
ई सावन मह बुलाइ ला भइया जब से ब्याह भयउ पारे माछूट गइल मोरा बाबुल घर भइयाअबकी बरस मंगाइ ला हमकाई सावन मह बुलाइ ला भइया अंबुवा तरे झुलवा डलवाइ कैसखियन संग मोहि झुलाय द भइया रिमझिम पड़इ सावन की फुहरिया बचपन कइ याद दिलाय द भइया बाबुल के आँखों की पुतरी बचपन संग संग … Read more
मौसमी दोस्त
मौसमी दोस्त मिलते हैं और चले जाते हैं हवा के झोंकों की तरहआकाश में उड़ते हुए झूठे बादलों की तरह प्रकृति के मौसम की तरह क्यों करें भला इंतज़ार जानता हूँ तुम चले जाओगे लौटकर आओगे भी कि नही भ्रम में जीना नहीं चाहतातेरे लिये मरना नहीं चाहता ..तुम नही हो तो क्या हुआ सोच … Read more
पिता जी के अन्तिम शब्द
नवम्बर उन्नीस सौ बान्नवे स्थल -मेडिकल कालेज, लखनऊयाद आते हैं वे शब्द जो आपके मुख से निकले थे डाक्टर साहब !! “मैं मरना नहीं चाहता”यही तो वे अन्तिम शब्द थे जो ज़हन में आज भी घूमते हैं मैं खड़ा रहा शून्य सा ..किंकर्तव्यविमूढ़ कभी डाक्टर की भाव भंगिमा को परख रहा था कभी पिता जी … Read more