औघड बाबा तांडव फाग
डम-डम डमरू गूँज उठा जब, काँपा काल-कपाल।भस्म-विभूषित देह महेश की, दहके दिग-दिग ज्वाल॥चिता-राख की उड़ती होरी, नभ पर रचे वितान।जग की झूठी शान जला कर, हँसे श्मशान-भवान॥त्रिपुंड अंकित भाल प्रखर, दृग में विद्युत-रेखा।एक दृष्टि में भस्म करैं, माया-जाल सहेजा॥मृग चर्म, व्याघ्रचर्म लहरत, डोले डमरू-ताल।प्रलय-नर्तन कर औघड़ बोलेसब जग माटी लाल!”॥जहाँ बुझी हर आस मनुज की, … Read more