मेघ दोहे

धरती सारी तप रही, मेघ हुए नाराज ।

सुबह आती शाम गयी, रोज़ रोज़ का काज ॥

जीवन दूभर हो गया, घर बैठे दिन रात ।

विपदा किससे हम कहें, सबकी एक ही बात ॥

विनय करूं वंदन करूं, हे इन्द्र महाराज ।

दया करो हम पर जरा, आ बरसो सुर राज ॥

इंतज़ार हम कर रहे, हे मेघों दिन रात ।

झूम कर आ ही बरसो, मानो मेरी बात ॥

घनघोर घटा छा रही, बूँदें न गिरती एक ।

मेघ हमें तरसा रहे, पाले मन में टेक ॥

मन मयूर मकरंद भये, मन में नाचे मोर ।

वर्षा बहुत सुहावनी, पवन रही झकझोर ॥

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