धरती सारी तप रही, मेघ हुए नाराज ।
सुबह आती शाम गयी, रोज़ रोज़ का काज ॥
जीवन दूभर हो गया, घर बैठे दिन रात ।
विपदा किससे हम कहें, सबकी एक ही बात ॥
विनय करूं वंदन करूं, हे इन्द्र महाराज ।
दया करो हम पर जरा, आ बरसो सुर राज ॥
इंतज़ार हम कर रहे, हे मेघों दिन रात ।
झूम कर आ ही बरसो, मानो मेरी बात ॥
घनघोर घटा छा रही, बूँदें न गिरती एक ।
मेघ हमें तरसा रहे, पाले मन में टेक ॥
मन मयूर मकरंद भये, मन में नाचे मोर ।
वर्षा बहुत सुहावनी, पवन रही झकझोर ॥