कुछ अपनी कह कुछ मेरी सुन

कुछ अपनी कह, कुछ मेरी सुनजरा मेरी सुन, मन की बातचार दिनों का जग मेला हैमन की बात जरा मेरी सुन▪️पहले भी हम झगड़ते थेमान मनौव्वल करते थेमन में नहीं पाला अनमनहंस कर गले मिलते थे▪️ज़िद पर हैं हम अड़े हुएपरिपक्व अभी हम नहीं हुएतर्क की है कमी नहींवितर्क में हम फँसे हुए▪️क्यों रखे मन … Read more

हे हरि तेरी शरण मैं पाऊँ

हे हरि ! तेरी शरण मैं पाऊँ मन की बात कहूं मैं कैसे कैसे प्रभु बताऊँ चाह अलग है सोच अलग है कैसे परमात्म सुख पाऊँ । हाथ आपका हो मेरे सर पर पशु पक्षी कंकड़ पत्थर बन जाऊँ चेतन हो या रहूँ अचेतन मैं न कभी पछताऊँ । स्वार्थ मय यह दुनिया है कहीं … Read more

नन्ही परी

तू तो है इक नन्ही परी सबके दिल की धड़कन ढेर ख़ुशियाँ तुझसे जुड़ी स्वागतम् ! स्वागतम् !छोटे छोटे बने हाथ तेरे छोटे छोटे हैं पाँव तेरे छोटी सी तू गुड़िया जैसी स्वागतम् ! स्वागतम् ! हर्षित है खूब मेरा मनहोने वाला तेरा आगमनझूम रहें हम ख़ुशियों में स्वागतम् ! स्वागतम् ! आ जा रे … Read more

वट वृक्ष

साक्षात तुम देव तुल्य लगते हो बैठा था एक दिन जीवन की आपाधापी से दूर एक बूढ़े बट वृक्ष की शीतल छाँव में अद्भुत, असीम शांति पूँछ बैठा बूढ़े वृक्ष से इतनी शीतलता कहाँ से लाते हो ?अनगिनत जीवों को बसेरा देते हो खाने के लिये फल देते हो बदले में कुछ भी तो नहीं … Read more

लगता है उम्र थक गई

लगता है अब उम्र थक गई मन की तृष्णा सुस्त हो गई वैराग्य मय जीवन हो चला सोच ही परिवर्तित हो गईचीजें दिखती थी जो नयी धूमिल चमक अब हो गई नश्वर स्वरूप संसार यह बात समझ में आ गईअस्थि मंजा से बनी काया बेगानी सी लग रही अनुभूति स्पंदित साँसों की एक खटक सी … Read more

मैं और मेरी चिड़िया

मैं और वो मेरी चिड़िया दोनों घंटों बातें करते हैं वह डाल पर बैठी रहती है मैं छत पर बैठा रहता हूँ..छत पर बैठा योगा करने ध्यान मेरा भंग हो रहा टुकुर टुकुर ताकती रहती है प्रेम प्रदर्शित करती है मुझ पर ही नज़र गड़ी उसकी आकृष्ट मुझे वो करती है मैं उसे देखता रहता … Read more

रे मन जोड़ प्रभु से नाता

रे मन ! जोड़ केवल प्रभु से नाता छोड़ टेक मन में कर विचार प्रभु भजन ही कलियुग का आधार जल मंथन से जैसे मक्खन न मिलता प्रभु कृपा बिन भव सागर न तरता ..गंग तीर बसने से क्या होता पशु बेचारा खूंटे में बँधा रहता स्वामी जब तक बंधन न खोले वह तो प्यासा … Read more

हे जग तूने मुझे क्यों बौराया

हे जग ! तूने मुझे क्यों बौराया तेरे यथार्थ को जान लिया हैछल कपट को पहचान लिया है देखने मात्र में तू अति सुन्दर है वस्तुतः तू विषयों का गृह है इन विषयों में मन क्यों बौराया तू तो है केवल इक माया ..जैसे केले में गूदा नहीं होता छीलो कितना छिलका ही निकलता तेरा … Read more

श्रृंगार गीत लिखना नहीं आता

लिखना चाहता हूँ श्रृंगार गीत पर शब्द चयन नहीं आता प्रेम परिभाषित करूं कैसे जब प्रेम जताना ही नहीं आता क्या करूँ कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ भावपूर्ण मधुर शब्दों को पास बैठी सुन्दर गोरी से बतियाना भी तो मुझे नहीं आता ।सोच मेरी छिछली है समन्दर से मोती मैं चुन नहीं पाता जमीं पर … Read more

अकेला

अकेला चला था अकेले ही जाना जीवन का कारवाँ है इक फसाना ..भटक हम गये हैं टेढ़े मेढ़े डगर हैं कौन सी डगर पे कदम है बढ़ाना मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए राही भूल गये अपना असली ठिकाना ।विषयों में इतने हम जकड़े हुए हैं चिपकें मोम सा मुश्किल है छुड़ाना आया यहाँ था अपनी … Read more