हे जग तूने मुझे क्यों बौराया

हे जग ! तूने मुझे क्यों बौराया

तेरे यथार्थ को जान लिया है

छल कपट को पहचान लिया है

देखने मात्र में तू अति सुन्दर है

वस्तुतः तू विषयों का गृह है

इन विषयों में मन क्यों बौराया

तू तो है केवल इक माया ..

जैसे केले में गूदा नहीं होता

छीलो कितना छिलका ही निकलता

तेरा अस्तित्व है तो कैसे

ईश्वर से तू विलग है कैसे

तू तो केवल इक दृश्य मान जगत है

तू है केवल ईश्वर की माया .

तेरे लिये अनेक जन्मों में भटका

अनेक योनियों में जा पहुँचा

मोह रूपी मृगतृष्णा की नदी में

तूने मुझे बार बार डुबोया

अब तू चाहे जितना छल कर ले

मैं तो प्रभु की शरण मैं आया

अहंकार और काम नही है

यहाँ तेरा कोई स्थान नहीं है

जाकर डाल अपना वहाँ पर डेरा

जहां भगवान न बसते हों

मेरे हृदय में मेरे प्रभु विराजे

नहीं चलेगी अब तेरी माया ..

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