लगता है अब उम्र थक गई
मन की तृष्णा सुस्त हो गई
वैराग्य मय जीवन हो चला
सोच ही परिवर्तित हो गई
चीजें दिखती थी जो नयी
धूमिल चमक अब हो गई
नश्वर स्वरूप संसार यह
बात समझ में आ गई
अस्थि मंजा से बनी
काया बेगानी सी लग रही
अनुभूति स्पंदित साँसों की
एक खटक सी अब हो गई .
आसक्ति तन से न रही
मन में विरक्ति हो गई
प्रभु भजन बिन जीवन की
निर्थकता समझ में आ गई
स्वार्थ मय यह जग दिखा
अपना भला सब अनभला
अपना रक्त भी दूषित हुआ
लगता है उम्र अब थक गई ॥