रे मन ! जोड़ केवल प्रभु से नाता
छोड़ टेक मन में कर विचार
प्रभु भजन ही कलियुग का आधार
जल मंथन से जैसे मक्खन न मिलता
प्रभु कृपा बिन भव सागर न तरता ..
गंग तीर बसने से क्या होता
पशु बेचारा खूंटे में बँधा रहता
स्वामी जब तक बंधन न खोले
वह तो प्यासा ही बना रहता
पक्षी तोता अक्षर अक्षर रटता
समझ में कुछ नहीं आता
पुराण पठन से अज्ञान न मिटता
जब तक मन से अमल न करता
मानव विषयों में जकड़ा रहता
भौतिक संग्रह में सुखी होता
छिनते ही वह रोने लगता
कैसे जुड़े वंदे प्रभु से नाता .
न कोई साधन न कोई सिद्धि
न वैदिक विधियों का ज्ञाता
न जप तप है न आत्म शुद्धि
कैसे जुड़े मेरा प्रभु से नाता..
रे मन । जोड़ केवल प्रभु से नाता ।
#सर्वाधिकार सुरक्षित स्वरचित भजन