लिखना चाहता हूँ श्रृंगार गीत पर शब्द चयन नहीं आता
प्रेम परिभाषित करूं कैसे जब प्रेम जताना ही नहीं आता
क्या करूँ कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ भावपूर्ण मधुर शब्दों को
पास बैठी सुन्दर गोरी से बतियाना भी तो मुझे नहीं आता ।
सोच मेरी छिछली है समन्दर से मोती मैं चुन नहीं पाता
जमीं पर बैठकर नभ से चाँद तारे तोड़ लाना नहीं आता
सूर्य चन्द्र फीका पड़ जाता कवियों की उपमा के सामने
करें तो कैसे करें उपमेय को उपमा में पिरोना नहीं आता ।