साक्षात तुम देव तुल्य लगते हो
बैठा था एक दिन
जीवन की आपाधापी से दूर
एक बूढ़े बट वृक्ष की शीतल छाँव में
अद्भुत, असीम शांति
पूँछ बैठा बूढ़े वृक्ष से
इतनी शीतलता कहाँ से लाते हो ?
अनगिनत जीवों को बसेरा देते हो
खाने के लिये फल देते हो
बदले में कुछ भी तो नहीं लेते ..
साक्षात तुम देव तुल्य लगते हो
मानव से आख़िर क्या पाते हो
धार दार कुल्हाड़ी
विकास के नाम पर कट जाते हो
कुछ भी नहीं बोलते
ज़रूर रोते होगे, आंसू बहाते होगे ..
परन्तु हमें कोसते नहीं होगे
इतना बड़ा बलिदान
एक तपस्वी ही कर सकता है
महा दानी दधीचि जैसे
साक्षात तुम देव तुल्य लगते हो ।
मेरे प्रणम्य हो