कुछ अपनी कह, कुछ मेरी सुन
जरा मेरी सुन, मन की बात
चार दिनों का जग मेला है
मन की बात जरा मेरी सुन
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पहले भी हम झगड़ते थे
मान मनौव्वल करते थे
मन में नहीं पाला अनमन
हंस कर गले मिलते थे
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ज़िद पर हैं हम अड़े हुए
परिपक्व अभी हम नहीं हुए
तर्क की है कमी नहीं
वितर्क में हम फँसे हुए
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क्यों रखे मन में उलझन
पास बैठ मेरी कुछ सुन
विधि ने यही विधान रचा
हम इक दूजे के लिए बने
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सोच सोच में भेद ही तो
इक दूजे में करता अंतर
क्यों ढूँढ रही मुझमें अवगुण
कुछ अपनी कह, कुछ मेरी सुन
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हृदय में धधकती ज्वाला को
शांत कर चित्त स्थिर मन
तू तो है मेरे दिल की धड़कन
धक् धक् को मेरी तू सुन