हे हरि तेरी शरण मैं पाऊँ

हे हरि ! तेरी शरण मैं पाऊँ

मन की बात कहूं मैं कैसे

कैसे प्रभु बताऊँ

चाह अलग है सोच अलग है

कैसे परमात्म सुख पाऊँ ।

हाथ आपका हो मेरे सर पर

पशु पक्षी कंकड़ पत्थर बन जाऊँ

चेतन हो या रहूँ अचेतन

मैं न कभी पछताऊँ ।

स्वार्थ मय यह दुनिया है

कहीं नही है ठाऊं

एक ही मनोकामना मेरी

प्रभु तेरी शरण मैं पाऊँ ।

मोक्ष की नहीं चिंता है मुझको

न यम का मुझे डर है

चाह यही है श्री चरणों की

चरण धूलि मैं जाऊँ ।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.