अकेला चला था अकेले ही जाना
जीवन का कारवाँ है इक फसाना ..
भटक हम गये हैं टेढ़े मेढ़े डगर हैं
कौन सी डगर पे कदम है बढ़ाना
मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए राही
भूल गये अपना असली ठिकाना ।
विषयों में इतने हम जकड़े हुए हैं
चिपकें मोम सा मुश्किल है छुड़ाना
आया यहाँ था अपनी बिगड़ी बनाने
बनाया यहाँ अपना स्थायी ठिकाना ।
सतत चलता रहा हूँ भटकता रहा हूँ
युगों युगों से मेरी यही कहानी रही है
ये चोला बदला और वो चोला बदला
चोले से बाहर मुश्किल निकल पाना ।
कितने भाई हुए कितनी बहनें हुई है
कितने माँ बाप और सम्बन्धी हुए हैं
सम्बंधों का ये मेला मेले में अकेला
अकेला चला था अकेले ही जाना ।