मौसमी दोस्त मिलते हैं
और चले जाते हैं
हवा के झोंकों की तरह
आकाश में उड़ते हुए झूठे बादलों की तरह
प्रकृति के मौसम की तरह
क्यों करें भला इंतज़ार
जानता हूँ तुम चले जाओगे
लौटकर आओगे भी कि नही
भ्रम में जीना नहीं चाहता
तेरे लिये मरना नहीं चाहता ..
तुम नही हो तो क्या हुआ
सोच रहा हूँ
इन हवाओं से बात कर लूँ
कुछ अपनी कहूँ कुछ इनकी सुनूँ
पर उफ़ ये उन्मुक्त हवायें भी कहाँ ठहरती हैं
घूमती रहती हैं इधर उधर
पूरब से पश्चिम, पश्चिम से पूरब
एक लेखक की कल्पना में
कुछ न कुछ तो चलता रहता है
मौसमी दोस्तों की तरह ..