हे माते कैकेयी !
क्यों माँगा तूने दो वरदान
किसके लिए ??
बेटे भरत के लिए
लगता तो नही .
राम को तो तू ज़्यादा चाहती थी
प्राणों से भी अधिक ..
मेरा राम मेरा राम
दिन रात यही रटती थी
मन नहीं मानता माँ
क्यों नहीं खोला अपना मुँह
चुप्पी साधे रही
अपयश लिया, पति को खो दिया
बेटे भरत से भी तो विमुख हुई ..
कौन समझ पाया है
तेरे अन्तर्मन में छिपे भावों को,
तेरे त्याग, समर्पण और बलिदान को,
अपने राम से तेरे गूढ़ प्यार को ..
संसार वही देखता है
जो प्रत्यक्ष दिखता है
नेपथ्य के पीछे के किरदार को
भला कौन महत्व देता है..
हे माते ! तूने सही किया
रहस्य को रहस्य रहने दिया
प्रभु के अवतार को अवतार रहने दिया
जो केवल तू जानती है
या तेरा राम जानता है.
सही माने में तू ही है माँ
रामायण की सूत्रधार
तू ही स्तंभ है रावण के विनाश का
धरा पर प्रभु राम के अवतार का
चिंता नही की अपने अपयश की
सहती रही मानसिक प्रताड़नाएं
दुख और पश्चाताप
अडिग रही चट्टान जैसी
अपने कर्तव्य पथ पर
धर्म की स्थापना के लिए
अपने राम को पुरुषोत्तम राम बनाने कि लिये
हे माते !
तू प्रशंसनीय है, वंदनीय है..
कृतघ्न तो हम हैं
जो नहीं समझ सके तुझे.