पिता जी के अन्तिम शब्द

नवम्बर उन्नीस सौ बान्नवे

स्थल -मेडिकल कालेज, लखनऊ

याद आते हैं वे शब्द

जो आपके मुख से निकले थे

डाक्टर साहब !!

“मैं मरना नहीं चाहता”

यही तो वे अन्तिम शब्द थे

जो ज़हन में आज भी घूमते हैं

मैं खड़ा रहा शून्य सा ..किंकर्तव्यविमूढ़

कभी डाक्टर की भाव भंगिमा को परख रहा था

कभी पिता जी के जुड़े हुए

काँपते दोनों हाथों को ..

खो दिया मैंने आपको असमय ही

आपकी वे स्मृतियाँ

मानस पटल पर गहरे तक रेखांकित हैं

अवसर पाकर उभार पाती हैं

दिन भले ही गुजरता जाता हो

नहीं भूल पा रहा हूँ आपको ..

ढूँढता हूँ पुरानी यादों के स्मृतियों में

एक धुंधली सी परछाई डोलती हुई दिखती है

जैसे कोई पुत्र अपने पिता की

ऊँगली पकड़े चला जा रहा हो .

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