बैठा हूँ बालकनी में,
वृक्षों की शृंखला देख रहा हूँ,
कल जो हरे भरे थे,
आज ठूंठ जैसे दिख रहे हैं।
जीवन की यात्रा में कई मोड़ आते हैं,
कुछ खुशियाँ, कुछ गम के साथ जाते हैं,
पत्तों की तरह हम भी गिरते हैं,
पर नए जीवन की उम्मीद में फिर से उठते हैं।
जैसे पत्ते गिरते हैं,
वैसे ही जीवन की पल-पल बदलती है,
एक पल में हरा-भरा,
दूसरे पल में सूखा और उदास।
लेकिन जीवन की इस यात्रा में,
हमें सीखने का मौका मिलता है,
गिरने से उठने का,
और उठने से आगे बढ़ने का।
निराशा है तो आशा भी है,
जीवन है तो मृत्यु भी है,
मृत्यु है तो आगे नया जीवन भी है,
यही तो जीवन चक्र है।
कुछ दिनों में नयी नयी कलियाँ आयेंगी,
बहारें फिर लौटेंगी,
सूखे चमन में फूल फिर खिलेंगे,
फल भी लगेंगे, जीवन का नया अध्याय लिखेंगे।