कवि चला गाँव की ओर अवधी
कवि बहुत रहे हो शहरन मा,चलऽ अब गाँव कइ ओर।सुघ्घर हवा, मीठ जल पावऽ,सुख मिलइ हर इक ठौर॥कटि गवा गन्ना खेतन मा,ट्रैक्टर ऊपर लदाय।फैक्ट्री कइ राहे चलि दीन्ह,मीठे सपना सजाय॥गेहूँ हँसइ हरियर-हरियर,बाली आवइ तैयार।सरसों ओढ़े पीयर चुनरिया,खेतन लागे त्यौहार॥अरहर बोले हमहूँ हईं,पीछे काहे रह जाय।दानन भरी बाली लहराय,गाँव कइ शान बढ़ाय॥मटर बोले ठहर जरा,अबहीं बचपन … Read more