शीत उष्ण बरसात हो, झेल रहे दिन रात ।
खुले गगन के ही तले, कटे ठिठुरती रात ॥
छत विहीन ये ज़िन्दगी, होती बहुत दुरूह ।
सर्द ठिठुरती रात में , उड़ जाती है रूह ॥
जाये तो जाये कहाँ, है न कोई उपाय ।
रोज़ी रोटी के लिये, जगह जगह भरमाय ॥
दर दर ठोकर खा रहे, ये गरीब निर्दोष ।
विकास चतुर्मुखी हुआ, ये व्रत रखें प्रदोष ॥
अभिशापित है ज़िन्दगी, दर दर ठोकर खाय।
ऐसा जीना क्या हुआ, अच्छा हो मर जाय ॥