ठहराव

थोड़ा थक गया हूँ, विश्राम चाहता हूँ,

लंबी यात्रा जो कर ली है, कुछ ठहराव चाहता हूँ ।

ज़िन्दगी में पीछे मुड़ कर नहीं देखा

अपने ही आत्म बल पर बढ़ता ही रहा हूँ मैं,

देखा सुना बहुत है जीवन यात्रा में अब तक

कुछ खट्टे, कुछ मीठे, जैसे भी रहे हो

उन्हीं का रस पान चाहता हूँ ।

दूर निकलना छोड़ दिया

ऐसा नही है कि चलना छोड़ दिया है,

जो याद करते हैं मुझे, उनसे नहीं मिलना छोड़ दिया है

हाँ ज़रा अकेला हूँ, दुनिया की भीड़ में

पर ऐसा नही की मैने अपनापन छोड़ दिया है ।

याद करता हूँ, अपनों को, बीते लम्हों को,

परवाह भी है उनकी मन में,

बस कितना करता हूँ, ये जताना छोड़ दिया है

शिकवा शिकायत कुछ नही

अच्छा बुरा सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया है ।

थोड़ा थक गया हूँ, विश्राम चाहता हूँ,

लंबी यात्रा जो कर ली है, कुछ ठहराव चाहता हूँ ।

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