बँट गये वे अपने
वे दिन याद आते हैं २ जब साथ बैठते थे अपने कहाँ गये सब अपने बँट गये स्वार्थ में अपने .मिलने को दौड़ते थे दौड़ कर गले लगते थे अब मिलते हैं तो वे नज़र चुराते हैं कहीं सामना न हो जाए धीरे से कतराते हैं लगता कितना सूना सूना वे नहीं रहे अब अपने … Read more