बँट गये वे अपने

वे दिन याद आते हैं २

जब साथ बैठते थे अपने

कहाँ गये सब अपने

बँट गये स्वार्थ में अपने .

मिलने को दौड़ते थे

दौड़ कर गले लगते थे

अब मिलते हैं तो वे नज़र चुराते हैं

कहीं सामना न हो जाए

धीरे से कतराते हैं

लगता कितना सूना सूना

वे नहीं रहे अब अपने

बीते बातें याद जब करते

लगते हैं सब सपने ।

वे दिन याद आते हैं

जब साथ बैठते थे अपने । २

बदल गया क्या मेरे अंदर

वो तो वो ही जाने

घुस गयी बीच में द्वेष भावना

छल कपट और स्वार्थ है

मन नहीं रहा अब निश्छल

सब बदल गये अब अपने

मेरा तेरा सोच की धारा में

बह गये सब अपने ।

वे दिन याद आते हैं

जब साथ बैठते थे सब अपने । २

बदल गया क्या समय है

या समय से हम बदल गये

कैसा यह परिवर्तन है

इधर उधर हम बिखर गये

प्रेम स्नेह में हुई कमी है

पराये लगते सब अब अपने

वे दिन याद आते हैं ..

जब साथ बैठते थे सब अपने । २

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