हे कान्हा ! अब तुम आ जाओ
अपना सुदर्शन चक्र चला जाओ ॥
धर्म हो रहा लुप्त प्राय
भारत माँ तुम्हें पुकार रही,
जो धरा आपने पोषित की थी
अक्षुण्णता विखंडित हो रही ।
जिस धरती पर तुमने जन्म लिया
वह अन्तर्वेदना से चीत्कार कर रही,
लहूलुहान हो रही आज धरा
हे कान्हा ! भारत माँ तुझे पुकार रही ।
टुकड़े टुकड़े हो गये भारत माँ के
अनेकों क्षेत्र कलेजे से पृथक हुए,
धरती माँ आँसू बहाती रही
कलेजे के टुकड़े को अलग करती रही ।
कोई क्षेत्र पाकिस्तान बना
कोई अफ़ग़ानिस्तान बना,
बांग्लादेश की स्थिति देख
धरती माँ आज रो रही ।
मन फफक फफककर रोता है
हे कान्हा ! तेरे अस्तित्व पर भी
आततायियों ने है प्रहार किया
आँख मूँद कर सत्ता समर्थन कर रही ।
ये सब भारत के ही तो टुकड़े थे
भारत पर ही प्रहार कर रहे,
भाई भाई बने जान के दुश्मन
मानवता चीत्कार कर रही ।
पूरे विश्व में डंका बजता था
भारत की तू ती बोलती थी
अर्जुन का अब वह गांडीव नही
स्थिति बद से बदतर हो रही ।
हे कान्हा ! अब तुम आ जाओ
अपना सुदर्शन चक्र चला जाओ ॥