ये चंचल मन कुछ न समझे, मुझे उलझाए रहता है
एक जगह स्थिर नहीं होता, मुझे दौड़ाए रहता है ।
सुख में यह उछल रहा है, दुख में बैठकर रोता है
यह संसार एक जल का बुलबुला समझ नही आता है
अगले क्षण का पता नही वर्षों की योजना बनाता है
क्षण भर में सपने ध्वस्त होते हाथ मलता रह जाता है ।
माया के मोह में फँसा हुआ इसी में उलझा रहता है
कभी हँसता है कभी रोता है ऐसे ही जीवन कटता है
जीवन के रंग बेमेल होते , एक सा रंग नहीं होता है
ख़ुशियों में ख़ुश रहता है दुख में दैव को कोसता है ।
जीवन की कटु सच्चाई समझनी होगी एक दिन
यह जगत तो एक सपना है जाना ही है एक दिन
छल कपट में पड़ा हुआ आज का इंसान रहता है
जो भी क्षण है हाथ में खुलकर ये नहीं जीता है ।