अन्नदाता किसान की पुकार
जोत रहा था वह खेतों को,धरती से सोना पाने को।गर्मी में तपता वह,परिवार की भूख मिटाने को।आधे तन पर कपड़ा, फटा पुराना,केवल इज्जत बचाने को।दो जून की रोटी पाने का ठिकाना नहीं,जो विधना उपलब्ध, उसी में भूख मिटाने को।कर्ज के बोझ तले पिसता,सूद पर सूद चढ़ता जाता।उगाही दूत जब घर में आता,चुपके से खिसक जाता।गरीब … Read more