“ भिक्षुक”
नाम तो अटपटा सा है
देखने में ऐसा ही लगता है
पर मेरे विचार से
जिसने इस गूढ़ शब्द का अर्थ
भलीभाँति समझ लिया
उसने परमात्म को जान लिया ..
इस मिथ्या संसार में
हम सभी भिक्षुक ही तो हैं
बिना भिक्षुक बने कोई ज्ञानी नही होता
ज्ञानी हुए बिना कोई संन्यासी नहीं होता ..
यह संसार क्या है ?
ख़ाली पानी के बबूले हैं
आकाश में बने इन्द्र धनुष हैं
केवल दृष्टि के लिए मनोरम है .
भिक्षा तो अमीर गरीब दोनों माँगते हैं
भक्त मन्दिर में जाकर
भगवान से भिक्षा माँगता है
हे प्रभु !! मेरी मनोकामना पूर्ण कर दो
मैं एक किलो लड्डू चढ़ाऊँगा
सोने का क्षत्र चढ़ाऊँगा
जिसकी जैसी हैसियत
उसका वैसे चढ़ावा
भगवान से एक सौदा करता है
प्रभु ! इस हाथ दे .उस हाथ ले
तो कोई मन्दिर के बाहर बैठा
क्षुधा पूर्ति हेतु
उसी से भिक्षा माँगता है
भिक्षुक तो आख़िरकार दोनों हुए
संसार बेकार है रखा क्या है
लेकिन यह चंचल मन तो वहीं जाता है
प्रश्न है अगर यह संसार इतना अच्छा है
तो भला भगवान बुद्ध
राज्य सुख क्यों छोड़ गये ?
क्योंकि उन्होंने राज महल देखा था
राज महल के भीतर क्या घटता है
वह नहीं देखा था,
यौवन देखा, वृद्धावस्था नहीं देखा था
चार कंधों पर ले जा रहे
अर्थी पर लेटे व्यक्ति को नहीं देखा था
मिथ्या जगत से मोह भंग हुआ
वैरागी हो गये,
तब भगवान बुद्ध कहलाये
तो क्या संसार सुख त्याग दे
भगोड़े बन जाये, कर्म हीन कहलाये
नही नही.ज़रूरी नही
इसी में जिए, जीने का भरपूर स्वाद लें
हाँ स्वाद जब खट्टा लगने लगे
मीठा हानिकारक हो जाये
स्वाद स्वयं ही कहने लगे
कि कुछ अब अच्छा नहीं लगता
सब फीका फीका लगता है
तब न वासना है, न स्वाद है
न वाद है, न विवाद है
केवल एक सात्त्विक विचार है
बढ़ चलें बुद्धत्व की ओर ..