पाश्चात्य जीवन

यहाँ देखता हूँ तो पाता हूँ

लोग एकाकी जीवन ज़्यादा जी रहे हैं

शौक से कम हैं

लगता है मजबूरियाँ ज़्यादा हैं

संयुक्त परिवार का चलन नही

वृद्ध स्वयं अपना भार उठाते हैं

बच्चे बालिग़ होते हैं

घर से बाहर कर दिये जाते हैं

हाँ समय काटते हैं

कुत्तों के साथ, बिल्लियों के साथ ..

दोस्तों के साथ उठने बैठने का,

गप लगाने का चलन नही ..

हाँ पुस्तक सच्ची मित्र है

लाइब्रेरी की मात्रा शोभा तक नही

शौक से पढ़ते हैं

ज्ञानार्जन करते हैं

यही कारण है कि

प्रसिद्ध लेखक, विद्वान

और वैज्ञानिक बनते हैं

मुझे भी यह अच्छा लगता है

पर एक सीमा तक

वैसे हमारे यहाँ भी

पाश्चात्य सभ्यता घर कर गयी

रिश्ते बेमानी हो रहे हैं

संयुक्त परिवार विलुप्त हो रहे हैं ..

इसी धारा में हम भी बह रहे हैं..

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