जय जयतु हे श्रमिक

जय जयतु !! हे श्रमिक !!

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ॥

घास फूस की झोपड़ी रिश्ता है संगमरमर से

तराशते हैं पत्थरों को आप अपनी उँगलियों से

गढ़ते जा रहे सुन्दर भवन रेत की नव लेखनी से

गगनचुंबी इमारतें खड़ी आपके ही कौशल से ॥

जय जयतु !! हे श्रमिक !

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ।

लिख रहे श्रम की गाथा अपने परिश्रम के बल पर

नृत्य करते आप हैं बाँस की बल्लियों पर चढ़कर

आपकी कारीगरी से पत्थरों में आ जाती मुस्कान

फूंक देते पत्थरों में प्राण पत्थर बन जाते भगवान ॥

जय जयतु !! हे श्रमिक !

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ।

झोपड़ी में जीवन है घास फूस ही होता भाग्य है

गढ़ते गगनचुंबी इमारतें बनाते धनाढ्यों का भाग्य हैं

गिला शिकवा किससे करें रोज़ी रोटी का सवाल है

श्रम के लिये हैं बने ईंट गारा रेत ही आपका भाग्य है ॥

जय जयतु !! हे श्रमिक !

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ।

गगनचुंबी भवन बनाते पट्टिका दूसरे की लगती है

बेनाम ज़िंदगी आप जीते न होता कोई इतिहास है

चुनते दिन रात स्वप्न दीवारों में स्वप्न दूसरे देख रहे

मत समझो समझ नहीं रहे हृदय धधकती आग है ॥

जय जयतु !! हे श्रमिक !

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ।

आका क़द छोटा नहीं आप ही हैं विकास की धुरी

विश्वकर्मा के आप सिपाही श्रम पर अपने नाज है

ऊंचे पहाड़ों को तोड़ देते खदानों को खोद डालते

ढूंढ लाते भूगर्भ से हीरे आपके सामर्थ्य पर नाज है ॥

जय जयतु !! हे श्रमिक !

आपके श्रम से ही हमारा भाग्य है ।

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