बेटी ! क्या दूँ तुझे भेंट
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट
तू तो उसी माँ की बेटी है
जो दहेज की बलि चढ़ी थी
याद हैं मुझे सब बातें
ज्यों की त्यों,,,,
पति ने गला घोटकर जला दिया
कह दिया रसोई में जल गयी
पर तू तो ज़िंदा रह गयी
तू ही बता बेटी - क्या दूँ तुझे भेंट??
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट
अभावों में तू पली बढ़ी
घर घर गयी दुत्कारी
बिन माँ बाप की बेटी को
कौन करता है प्यार भला ?
यही प्रार्थना करता हूँ
जीवन साथी मिले अच्छा तुझको
तेरी माँ बहुत खुश होगी
तुझे दुआयें देगी
बेटी ! क्या दूँ तुझे भेंट
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट
सावधान रहना बेटी
काँटों भरा तेरा जीवन पथ होगा
कब सुधरेगा यह समाज
कब तक मिलती रहेगी
मौत की सौग़ात
कहाँ जा रहे हैं हम
कहाँ जा रहा ये समाज
नव विवाहिता की मौत पर
न आती लोभियों को लाज
बेटी ! क्या दूँ तुम्हें भेंट
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट
रोज़ रोज की हेड लाइन है
पढ़ते पढ़ते बुद्धि जड़ हो गई
पर दहेज लोभियों की मति में
किंचित् सुधार न हुई
लाखों चढ़ जाती लड़कियाँ
रोज दहेज की बेदी पर,
नासूर है ये समाज के लिए
क़ानून भी हुआ लाचार ..
बेटी ! क्या दूँ तुम्हें भेंट
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट
एक सलाह तुझे मैं देता हूँ
जीवन से हार नहीं मानना है
यह जीवन तेरा जीवन है
तुझको अपना जीवन जीना है
तेरे जीवन से यदि कोई खेलता है
निकाल फेंकना अपने जीवन से
तेरा नही वो सच्चा जीवन साथी
कृतघ्न और लोभी है
बेटी ! क्या दूँ तुम्हें भेंट
लोभियों का नहीं भरता कभी पेट