कवि की वेदना

क्या छोड़ूँगा पीछे, क्या छोड़ूँगा पीछेसिर्फ़ शब्द मेरे साथी हैं,लेखनी मेरी पूंजी है,यही मेरी दुनिया है, यही मेरा विश्वास है।सोच रहा हूँ, अगर गया,तो क्या छोड़ूँगा अपने पीछे?खाली कमरे, सुनती दीवारें,और मेरे शब्द जो जीते रहे।भागम-भाग रहा है ये जीवन,संघर्षों से ही रहा नाता है।ठोकर खाकर समझा मैंने,अकेलापन भी साथी बन जाता है।अपने पास कुछ … Read more

साहित्य और सम्मान एक लेख

*** मित्रों इस लेख में मेरे अपने व्यक्तिगत विचार है, जरूरी नहीं कि सभी एक जैसे हैं, कोई अपने ऊपर न ले, अन्यथा न ले, मेरा केवल यहां सच्चाई लिखने का प्रयास भर है ॥मित्रों!! लेखन एक कला है,, माँ शारदे का वरदान है,, सभी को ये कला नहीं आती, मन के भावों की ये … Read more

भिक्षुक एक सत्य मार्ग

“भिक्षुक”नाम सुनते ही अटपटा लगता है,दिखने में साधारण, पर अर्थ गूढ़।जिसने इस शब्द को भलीभाँति समझ लिया,उसने परमात्म तत्त्व को जान लिया।इस मिथ्या संसार मेंहम सभी भिक्षुक ही तो हैं।बिना भिक्षुक बने कोई ज्ञानी नहीं होता,ज्ञानी हुए बिना कोई संन्यासी नहीं होता,और बिना वैराग्य केआत्मबोध कहाँ होता है?यह संसार क्या है?ख़ाली पानी के बबूले,आकाश में … Read more

अहम प्रश्न मैं कौन हूँ

एक प्रश्न हाँ, एक अहम प्रश्न!मैं कौन हूँ?सीधा उत्तर यहीमैं फलाना, अमुक नाम, अमुक गोत्र,या फिर बस एक मानव, एक देहधारी।पर यह तो सबको दिखता है,सब जानते हैं।तो फिर परम सत्य क्या है?क्या हम उसे जानना नहीं चाहते,या जानबूझकर झुठला रहे हैं?आत्मा क्या है?परमात्मा से इसका क्या जुड़ाव?क्या आत्मा परमात्मा का ही अंश नहीं?यदि है, … Read more

क्या वास्तव में जमाना बदल गया है लेख

रोज़ तारीख बदलती है,रोज़ दिन बदलते हैंरोज़ अपनी उमर भी बदलती है,रोज़ समय का रंग बदलता है।हमारे नज़रिये भीवक्त के साथ बदलते हैंबस एक ही चीज़ हैजो नहीं बदलतीऔर वो हैं हम खुद।यही वजह है कि हमें लगता हैकि अब ज़माना बदल गया है।हर इच्छा पूरी हो,ये ज़रूरी तो नहीं।कुछ इच्छाएँ शेष भी रहनी चाहिए,जीने … Read more

मन का अन्तर्द्वन्द्व लेख

मन व्यथित है, चल रहा भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द्व, आखिर क्या है जीवन का उद्देश्य?केवल वस्त्र, भोजन या आवास, या हवाई यात्रा, मौज मस्ती, सब कुछ तो ये अस्थायी है, केवल छलावा है , अचानक छिन जाता है एक दिन,जीवन भर की पूंजी अस्पताल में चली जाती है, पर फिर भी हाथ कुछ नहीं … Read more

उतरे भीतर साँस की छोर

उतरे भीतर साँस की छोर,सार तत्व को ले हम निचोड़।प्रश्न उठता है – भीतर क्या है?भीतर भला हम क्यों उतरें?क्या लाभ है, क्या हानि है,कैसे जाने भीतर बिन उतरे?बाहर बाहर देख रहे हैं,बाहर की दुनिया चमकीली।इसी चमक में दुनिया पागल,भ्रमित घूम रहे गली–गली।जीवन मोती यदि चुनना है,लगाएँ गहरी डुबकी ज़ोर।उतरें भीतर साँस की छोर,सार तत्व … Read more

मिश्रित मुक्तक भाग एक 125

1 मानव मन की धौंकनी, देख प्रभू के हाथ तू तो कठपुतली मात्र है, तेरे कुछ नही हाथमत ग़ुरूर कर इतना हानिकारक होता अभिमान एक दिन जग से जायेगा, तू केवल ख़ाली हाथ ॥ 2 सच्चा साधक है वही हर पल करता प्रभु का ध्यानव्यर्थ की बातों में न उलझे न दिखाये मिथ्या शानअपना कर्म … Read more

ऐ ज़िंदगी जरा धीरे धीर चल गीत

ऐ ज़िन्दगी ! ज़रा तू धीरे-धीरे चलहर पल को जी लूँ, अमूल्य हैं हर पल.काँटो को साफ कर सुन्दर राह तू दिखा ज़िन्दगी को जीने का सलीका तू सिखा राहों में बिछा दे खुशियों के फूल तूदेखकर मन जाए जाए मेरा मचल ॥ हर पल को जीने का मज़ा लेंगे हमखुशियों के फूलों को देख … Read more

अकेला चलो गीत

अकेले आये हो, अकेला चलोमिले जो प्रेम से पथ में, उन्हें गले लगाते चलोमत सोचो लोग क्या कहेंगे अच्छा था या बुरा, सच्चाई की राह पर मिलती हैं अड़चनें घबड़ाना नही, सच्चाई की राह छोड़ना नही, कोई साथ चले या न चले , अकेला चलो । जब दिल से प्यार होता है पचीस तरीक़े मान … Read more