अहम प्रश्न मैं कौन हूँ

एक प्रश्न हाँ, एक अहम प्रश्न!

मैं कौन हूँ?

सीधा उत्तर यही

मैं फलाना, अमुक नाम, अमुक गोत्र,

या फिर बस एक मानव, एक देहधारी।

पर यह तो सबको दिखता है,

सब जानते हैं।

तो फिर परम सत्य क्या है?

क्या हम उसे जानना नहीं चाहते,

या जानबूझकर झुठला रहे हैं?

आत्मा क्या है?

परमात्मा से इसका क्या जुड़ाव?

क्या आत्मा परमात्मा का ही अंश नहीं?

यदि है, तो दोनों पृथक कैसे?

आत्मा अजन्मा है

न जन्म लेती, न मरती।

जब जन्म ही नहीं, तो मृत्यु कैसी?

ना वर्तमान, ना भूत, ना भविष्य

वह तो नित्य, शाश्वत, सनातन है।

यह शरीर ही है

जो कभी बालक, कभी युवा, कभी वृद्ध।

यदि शरीर वृद्ध होता है,

तो आत्मा को नया शरीर क्यों चाहिए?

यदि आत्मा पृथक है,

तो स्वजनों से मोह क्यों?

आत्मा की कोई शारीरिक वृद्धि नहीं,

तो संतान कैसी?

संतान तो शरीर की उपसृष्टि है।

शरीर केवल एक माध्यम,

आत्मा का उससे कोई बंधन नहीं।

मित्रों! प्रश्न उठता है

आखिर आत्मा और परमात्मा को

हम क्या समझें?

मेरे विचार में वे दो पक्षियों जैसे हैं

जो एक ही डाल पर बैठे हैं।

एक पक्षीअणु आत्मा, अर्जुन रूप में,

वृक्ष के मीठे रसीले फल का स्वाद ले रहा है।

दूसरा पक्षीकृष्ण रूप में,

सिर्फ देख रहा है।

दोनों पक्षी समान गुण वाले,

पर पहला फल का भूखा,

मोहग्रस्त अर्जुन।

दूसरा साक्षी मात्र,

भगवान श्रीकृष्ण।

वे भी भूखे हैं,

पर फल के नहीं,

भाव और प्रेम के।

उन्हें चाहिए केवल सखा का स्नेह।

अणु आत्मा की विस्मृतियाँ

ही उसके शोक और मोह का कारण हैं,

उसे एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर

भटकाती हैं।

पर जैसे ही पहला पक्षी

दूसरे को अपना गुरु मान लेता है,

सखा भाव से विलग हो जाता है,

भगवान वासुदेव से सीधे जुड़ जाता है।

तब गीता ज्ञान प्राप्त करता है,

भगवान की महिमा को पहचानता है,

शोक मुक्त हो जाता है,

और सहज ही उद्घोष करता है

“अहम् ब्रह्मास्मि।”

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