1
मानव मन की धौंकनी, देख प्रभू के हाथ
तू तो कठपुतली मात्र है, तेरे कुछ नही हाथ
मत ग़ुरूर कर इतना हानिकारक होता अभिमान
एक दिन जग से जायेगा, तू केवल ख़ाली हाथ ॥
2
सच्चा साधक है वही हर पल करता प्रभु का ध्यान
व्यर्थ की बातों में न उलझे न दिखाये मिथ्या शान
अपना कर्म वो करता है कर्म को करता प्रभु को अर्पित
फल की चिंता वो न करता समभाव मान अपमान ॥
3
सन्मार्ग पर सदा चल मानव, कुमार्ग से रहे दूर
कर ग़रीबों की कुछ सेवा, जो दिखते हैं मजबूर
दान देकर हिसाब न रखना, भूल जाना प्यारे इसे
बहीखाता तो अलग रखा, फल मिलता है जरूर ॥
4
निंदा करते रात दिन, फिर भी न मिलता चैन
कौन कितना कमा रहा, इसी में रहते बेचैन
अपने बारे में सोचिए, आप कहाँ है खड़े हुए
सुख शांतिपूर्ण जीवन जियें मस्त सोये रैन ॥
5
देश छोड़ा विदेश आये, विदेश में रम गये
शुद्ध वायु शुद्ध जल भोजन पाकर छक गये
क्या फ़र्क़ पड़ता कहाँ हूँ धरती पर ही रह रहा
वही चाँद, वही सूरज, वही दिन रात ढल गये ॥
6
बच्चों पर अन्याय है जो पलते आया हाथ
हालत बच्चों की देख लो पीटोगे अपना माथ
समय की है मजबूरियाँ पति पत्नी करते काम
बच्चे जीवन जी रहे, जैसे हो वे अनाथ ॥
7
कभी कभी चुप रहना मजबूरी भी होती है
पर हर बात पर चुप रहे कायरता होती हैं
भीष्म अगर बोले होते द्रौपदी का चीर हरण न होता
मौन अगर नियंत्रण की शक्ति तो कायरता भी होती है ॥
8
सोच रहा हूँ बोलने में अब नियंत्रण रखूँगा
कहना सरल करना कठिन, कैसे कर पाऊँगा
ग़लत बात को सुनकर कैसे चुप रह लूँ
न बोलूँ मन धिक्कारे कायर कहलाऊँगा ॥
9
बच्चों से ही परिवार है, बच्चे हैं संसार
बच्चों बिन सूना लगे, घर भीतर और द्वार
मन प्रसन्न हो देखकर बच्चों की इक मुस्कान
धन दौलत बेकार है, वेश क़ीमती यह प्यार ॥
10
प्रकाश का यह पावन पर्व अन्तर्मन को प्रदीप्त करे
फैले जीवन में उजियारा आशा और नव स्फूर्ति भरे
मॉं लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि बनी रहे हम सब पर
आओ मिलकर जगमगाये हस्त पर प्रज्वलित दीप धरे ॥
11
बच्चों की अपनी दुनिया है अपना उनका खेल है
मस्त खेलते रहते आपस में कितना सुन्दर मेल है
मन के ये हैं कोमल बच्चे भेदभाव मन में न रखते
सब बच्चे इक जैसे होते भले रंग इनके बेमेल हैं ॥
12
सुख दुख में जो साथ खड़ा, होता सच्चा जीवन साथी
बिना कहे जो समझे मन की,, वह सच्चा जीवन साथी
यदि मैं हूँ इक दीपक जैसा,तू है उस दीपक की ज्योति
आओ मिलकर जीवन की राह, रोशन करें साथ-साथी।
13
मैं कुछ नहीं जानता हूँ पर कुछ न कुछ जानता हूँ
आया हूँ आपके बीच में आपको तो मैं जानता हूँ
हौंसला है,आत्मविश्वास है,भरोसे में भी कमी नही
बोलूँगा कुछ न कुछ जितना मैं स्वयं को जानता हूँ ।
14
हे माँ ! शारदे दिखाओ सुगम पथ आज मुझको
मैं भक्त हूँ तुम्हारा आशीर्वचन दो आज मुझको
वाणी में आ विराजो सुर लहरी में हम बह जाये
चुनकर शब्द मोतियों की माला पहनाये तुमको ॥
15
चाह यही है मैं भी एक श्रेष्ठ कवि बन जाऊँ
फटे कंठ में कोकिल सा मधुर स्वर भर लूँ
छंद विधान से अनभिज्ञ ककहरा का ज्ञान नही
ऊटपटाँग लिख देता हूँ कैसे कवि मैं कहलाऊँ ॥
16
जो असफलता से घबड़ाते हैं वे कायर कहलाते हैं
जो ईंट से ईंट बजाते हैं आलीशान मकान बनाते हैं
चलता जी तू ऐ राही अनथक लक्ष्य किंचित दूर है
धैर्य रख निश्चित विजय विभूति तिलक लगाते हैं ॥
17
कर्म कांड में जीवन बीता करता रहा जो शास्त्र बताता
जितने ज्ञानी उतने रास्ते पग पग पर पथ बदलता जाता
कभी अयोध्या कभी काशी समझ न आया प्रभु अविनाशी
हृदय हृदय में वास प्रभु का ढूंढ रहा था बाहर विधाता ॥
18
हृदय स्थल में प्रभु विराजे दूषित मन निर्मल हो जाये
सब कुछ छोड़ तुझे मैं ध्याऊं यही चाह मुझे प्रभु भाये
विषयासक्त भ्रमित हो रहा बहुत कठिन यह जाल है
प्रभु भक्ति ही सुगम साधन है भवसागर से पार कराये ॥
19
जीवन जितना सादा होगा तनाव उतना आधा होगा
सुबह सुबह योग करें मन मस्तिष्क तरो ताज़ा होगा
योग करें स्वाध्याय करें मन से समर्पित हो प्रभु को
सृजित होंगे सुविचार सत्कर्म भाव अति प्रबल होगा।
20
सौन्दर्य देखना हो प्रकृति को देखो नेत्र देख ललचा जाये
सौंदर्य देखना हो सूरज को देखो उदय अस्त जब हो जायें
सौंदर्य देखना हो हर जीव में देखो ईश्वर की अनुपम कृति
सौंदर्य देखना हो बच्चों को देखो जब खुलकर मुस्कुरायें ॥
21
पहचाने तो कैसे पहचाने तेरी सूरत पहले जैसी नही रही
बदरंग हो गया तेरा चेहरा पहले वाली चमक नहीं रही
आवाज़ भी लड़खड़ा रही है तेरी हाँक में वह खनक नही
झुकी झुकी ये कमर हो गई कुछ और कहानी कह रही ॥
22
चलते फिरते गले लगायें प्रेम से मिले जो पथ में
होली का त्योहार आया क्यों पालें नफरत मन में
ईर्ष्या द्वेष भावना दूर भगायें मन के ये होते विकार
हिन्दू मुस्लिम ईश्वर के बंदे रंग जायें प्रेम रंग में ॥
23
पल जो बीत गये सो बीत गये वापस नहीं आते यार
मन को ये उद्वेलित करते सृजन करते विविध विचार
जीवन में प्रेम रंग अनेकों प्रति पल रंगों का अंबार
इन्हीं रंगों में ही घुल जाओ प्यारे बहे प्रेम रस धार॥
24
मृगतृष्णा में जो जीता है जीवन भर भागता रहता है
जीवन को वह नहीं जीता है जीवन उसे भुगतता है
जीवन के जो अमृत पल हैं ख़ुशियों उन पल में ढूँढो
ख़ुशियाँ जीवन की निधि है बाक़ी मिथ्या लगता है ॥
25
संगम के ये सूने पीपे कहते हैं मेरे पथिक सब कहाँ गये
मैंने तो दिया नहीं कोई उलाहना छोड़ मुझे क्यों चले गये
आ जाओ आ जाओ मेरे पथिकों मेरी तुम्हें जरूरत है
तुम से ही गुलज़ार रहा हूँ किसके सहारे मुझे छोड़ गये ॥
26
धन की गर्मी बहुत प्रबल है उबाल लाती है तन में
उछल कूद कराती नृत्य कराती ऐंठन लाती तन में
छूट गये रिश्ते नाते तराज़ू में रिश्तों को हैं तौल रहे
किसका कितना पलड़ा भारी है गुनते रहते मन में ॥
27
धन प्रधान ये युग है कलि का प्रभाव अब दिखता है
कलि ने आ डाला डेरा है अपना अपना ही चलता है
स्वार्थ की भेंट चढ़े रिश्ते नाते अब सब बेमानी हुए
धन नहीं तो सम्मान नहीं नैतिक पतन अब दिखता है ॥
28
जब अंधकार में हो जीवन शांति न मिलती मन को
करो ध्यान महादेव का सुख शांति मिलती मन को
महाशिवरात्रि मात्र पर्व नहीं शिवशक्ति का संगम है
हर संकट का है समाधान भज ले हर हर महादेव को ॥
29
यह ऐसी रात्रि है जब शिव शक्ति का संगम होता है
त्रिपुरारी का तांडव संहार नहीं प्रेम दर्शन ये होता है
जब तम में राह नहीं दिखती दिव्य ज्योति है मिलती
महादेव की अहैतुक कृपा पा मंगल ही मंगल होता है ॥
30
जब तक जीना शान से जीना सिर अपना ऊँचा रखना
समय आ जाये मत घबराना बिन आवाज़ चले जाना
शेर के जैसे जीवन जीना गुर्राहट में न हो जाये कमी
वीर रहे हो वीर ही रहना वीर की भांति ही विदा लेना ॥
31
खूब जमाओ सुरों की महफिल पटल पटल पर जा जाकर
देर शाम घर आओ माथा पीटो पत्नी की झिड़की खाकर
सब्ज़ी का झोला कहाँ गया क्या छोड़ आये इसे पटल पर
हे माँ सरस्वती के परम भक्त बुद्धि चरने गयी क्या खेत पर
32
फटा पुराना जो भी मिलता पहनो उसको शान से
सिर में बाल नहीं है बिग लगा लो मूँछें ऐंठो ताव से
आइना देखो क्या कहता है कहो उसे तुम झूठे हो
नहीं दिखाता अपनी सूरत लटकते रहो तुम दीवार से ।
33
बुढ़ापा आया मत घबराओ बदला लो अपने अंगों को
लेंस प्रत्यारोपण से स्पष्ट दिखता दृष्टि मिलती नेत्रों को
दांत टूटे चिंता मत करना पूरी बत्तीसी ही बदल जाती है
अंग अंग के पुर्जे हैं बिकते ख़रीद लो बिकते ग़रीबों को ॥
34
ऐ ज़िन्दगी ज़रा तू धीरे-धीरे चल
हर पल को जी लूँ अमूल्य हैं हर पल
राहों में बिछा खुशियों के फूल जरा तू
देखकर मन जाए जाये मेरा मचल ॥
35
भला कौन चाहता हैं बिछुरन, अपनों को त्याग कर जाये
पर अपनी वश कहाँ चलती है, यमदूत खींच कर ले जाये
भला कौन रहा इस धरती पर, किसने धरती को भोगा है
जन्म लिया जिस योनि में प्राणी एक दिन प्रस्थान कर जाये
36
सागर की लहरें कहती हैं, आओ बैठो जरा मेरे पास
बातें कर लो कुछ मुझसे, व्यथित मन में आये हुलास
थकान तन की मिटा दूँगी चेहरे पर बिखरेगी मुस्कान
सैलानियों का मन मोहती दूर दूर से आते मेरे पास॥
37
मंदिर जाओ, मस्जिद जाओ, चाहे जाओ गुरुद्वारा
घर में दिन भर बैठे टीवी देखो मौजमस्ती करो सारा
बच्चों से झगड़ा न करना पोत-पोतियों संग खेलना
पत्नी से झगड़ा न करना वो होती जीवन का सहारा ॥
38
मुस्कुराहट इसलिए नहीं कि खुशियां ज़िंदगी में ज़्यादा हैं
मुस्कुराहट इसलिए है कि ज़िन्दगी से न हारने का वादा है
धीर वीर संघर्षशील जो होते हैं नहीं झुकते कभी हार से
चुनौतियों से डटकर लड़ते हैं,फौलाद सा होता इरादा है ॥
39
नन्हें मुन्ने बच्चे मन के सच्चे कभी हंसते कभी रोते
सुन लो रुककर उनकी बातें जब ग़ुस्से में वे होते
कोमल तन है कोमल मन है कोमल है उनकी सोच
ईश्वर के रूप हैं होते बच्चे हंसते तो अच्छे लगते ॥
40
शिक्षा नीति ऐसी चाहिए, हुनर का हो विकास
न थोपे अपनी मर्ज़ी, न छीने बच्चों का हुलास
अलग-अलग होती रुचि, अलग अलग है सोच
जैसी जिसकी है रुचि , उसी में होता विकास ॥
41
ख़ुश रहने के लिये लिए बहुत कुछ इकट्ठा करना पड़ता है
हक़ीक़त है ख़ुश रहने के लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है
पा लेने की बेचैनी और खो देने का डर भटकाव है जीने में
दो पलड़ों के असन्तुलन में मानव मन भटकता रहता है ॥
42
धन वैभव से परिपूर्ण आज फिर भी संतुष्ट नहीं मन मेरा
विषयों में मन लिप्त रहा चक्रीय परिधि में लगाये फेरा
सिर पर भार लिये घूमता उतार देता मन हल्का हो जाता
ईश्वर भक्ति बिन ये न जाये मन तो सोचता है तेरा मेरा ॥
43
छलिया की मोहिनी सूरत पर महादेव ललचाए हैं
नंद के द्वारे औघड बाबा देख मां यशोदा भय खाये हैं
छलिया तो भीतर बैठा है, मंद मंद वो मुस्करा रहा
महादेव की विवशता पर छलिया चुटकी बजाये हैं ।
44
कह लीजिए जो कहना है मन में न रखें पछतावा
अगले क्षण का पता नहीं न जाने कब आ जाये बुलावा
बातें जो चुभती हैं मन में भीतर ही भीतर कुरेदती हैं
स्पष्ट बातें करती समाधान न करें केवल दिखलावा ।
45
सह लीजिए जितना सह सकते कहने में क्या रखा है
जो आनन्द स्वयं सहने में हैं कह लेने पर क्या रखा है
आनन्द बाह्य की अनुभूति नहीं भीतर की सोच होती है
हर हाल में रहिये खुश सदा आक्रोश में क्या रखा है ।
46
तुम ही मीत मेरे हो तुम ही गीत मेरे हो
तुममें यह जग समाया है मेरी रोम रोम में तुम हो
मैं क्यों सोचूँ इधर उधर जब तुम मेरे भीतर हो
हे सर्वेश्वर ! हे करुणानिधि ! तुम मेरे जगदीश्वर हो ।
47
जितना हम विनम्र रहेंगे उतना स्वयं को समझेंगे
जितना स्वयं को समझेगें उतना हम शांत रहेंगे
जितना शांत रहेंगे उतना ही मन निर्मल होगा
रख मन शुद्धता का भाव प्रभु का कृपापात्र बनेंगे ॥
48
हे शिवशंकर ! हे त्रिपुरारी ! आप हमारे परम पिता हैं
आपकी महिमा आप ही जानो हम तो अबोध बालक हैं
सुख सम्पत्ति मति सुगति के दाता जय हो भोलेनाथ की
विमल भक्ति आपकी पाऊँ उमानाथ आपकी शरण है ॥
49
हे मुरली धर ! हे राधे रमण ! अद्भुत महिमा है आपकी
मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ , श्रवण कर अद्भुत लीला आपकी
धन्य भाग्य वे सब प्राणी, जो साक्षी बने प्रभु लीला के
करूं गुणगान, नमन करूं, नित वंदन कृपानिधान की ॥
50
सुदामा जैसा मित्र बनूँ , भले ही भिक्षाटन करूं
अश्रु बहाये मेरे लिए कृष्ण मैं बैठा दीदार करूं
त्रैलोक्य संपदा नहीं चाहता इक झलक काफी है
प्रभु प्रेम प्यासे ये नयन मेरे इक बार दर्शन करूं ॥
51
कितना सुन्दर कितना मनभावन वह दृश्य रहा होगा
चरण पखारे श्रीकृष्ण अश्रु नेत्रो से जो बहता होगा
राजकाज त्याग कर दौड़े गरीब सुदामा से मिलने को
वो मधुर मिलन,वो मित्रता, कितना अद्भुत क्षण होगा ॥
52
हे मुरली धर ! हे राधे रमण ! इक दर्शन लालसा आपकी
इक झलक दिखला जाओ,,अपने मधुर मुस्कान की
वो बांसुरी की मधुर आवाज़ सुन चेतन अचेतन जड़ हुए
इक तान सुना जाओ उसी मीठी बांसुरी की आवाज़ की ॥
53
कृष्ण प्रेम में गोपिका बन जाऊँ, वन वन विचरण करूं
न रहे सुध बुध तन की, न मान मर्यादा की परवाह करूं
मन प्राण और आत्मा से समर्पित कृष्ण हेतु हो जीवन
शाश्वत आनन्द की अनुभूति हो कान्हा कान्हा रट करूँ ।
54
नाग बनूँ तो कालिया जैसा फ़न पर श्रीकृष्ण नृत्य करे
रक्त बह जाये चाहे जितना मुख से कभी न उफ़ करें
प्रभु लीला को नेत्रों से देखूँ प्रभु का मैं गुणगान करूं
हे श्रीकृष्ण! हे जगदीश्वर ! आपका नित ध्यान करें ॥
55
भक्त बनूँ प्रह्लाद जैसा, सेवक बनूँ मैं हनुमान सा
भातृ प्रेम हो भरत जैसा, प्रभु दास बनूँ निषाद सा
भक्ति में शबरी बन जाऊँ प्रभु को जूठे बेर खिलाऊँ
लक्ष्मण जैसा बनूँ मैं प्रहरी, धीर व्रती चट्टान सा ॥
56
पिता बनूँ मैं दशरथ जैसा, राम ही जीवन धन हो
पक्षी बनूँ जटायु जैसा, राम काज प्राण त्याग हो
मित्र बनूँ सुग्रीव जैसा, प्रभु के साथ मैं खड़ा रहूँ
पुण्यभागी बनूँ केवट जैसा, पुरखों संग तरनी हो ॥
57
मत करो अभिमान कभी, स्नेह का पात्र बनो सबका
अभिमान की आग विनाशक है नाशक है विवेक का
रावण बहुत ही ज्ञानी था, अभिमान उसका काल बना
लंका सारी ध्वस्त हुई अभिमान न छूट सका उसका ॥
58
अस्तित्व शेष रहा धरा पर, जो रहे संगठित होकर
विघटित होकर जो चले, ग्रास हुए वे चुन चुन कर
इतिहास गवाह डायनासोर इसी धरती पर रहते थे
कैसे विलुप्त हुए, प्रश्न चिन्ह लगा है अस्तित्व पर ।
59
आशा चाहे कितनी कम हो, निराशा से बेहतर है
एक सूर्य रश्मि आती खिड़की से तम से बेहतर है
अवसाद पूर्ण जीवन जीना, चिता से कम नही
जीवन में आशा की किरणें औषधि से भी उत्तम है ।
60
तन से यदि बीमार होगे तो चलेगा
स्वस्थ हो जाओगे पर कुछ समय लगेगा,
मन से यदि बीमार होगे ये बिल्कुल नहीं चलेगा
तन मन बुद्धि की शक्ति क्षीण ये करेगा ॥
61
अहंकार ख़ुश हो जाता जब कोई दूसरा झुकता है
संस्कार बोला नहीं नहीं झुकना मुझे अच्छा लगता है
त्याग नहीं सकता विनम्रता को मेरा चारित्रिक गुण है
संस्कारहीन जीवन जीना पशुत्व जैसा मुझे लगता है ॥
62
जो करे सम्मान बड़ों का, बनता चहेता दिल का
स्वयं में वह विशेष है, खून का हो, या बाहर का
सुसंस्कार ही मानव को, सिखलाये ऐसी शिक्षा
सर्व प्रिय कहलाये, आशीर्वाद प्राप्त हो सबका॥
63
फल उन्हीं वृक्ष में लगते हैं, जो नीचे झुके रहते है
जो छूते गगनचुंबियों को, ऊपर ऊपर ही बढ़ते हैं,
हलके से हवा के झटके में, खंड खंड वे हो जाते
जो धरती से है जुड़े , बेख़ौफ़ तटस्थ बने रहते हैं ॥
64
होते हैं भले लोग जो सदा ज़मीन से जुड़े होते हैं
उड़ान भरते जो आकाश में धरती पर आ गिरते हैं
होता मज़बूत उनका स्तंभ जिनकी नींव गहरी है
भूचाल भी आये तो अपनी जगह पर डिगे रहते हैं ।
65
बनाकर कार्टून कर रहे देवी देवताओं का अपमान
मन व्यथित, हृदय क्रंदित, कैसा है ये सम्मान ?
कहाँ जा रहा ये समाज, कहाँ जा रहे हैं हम ??
कितना गिरेगें असहनीय है आराध्य का अपमान ॥
66
कैसी सीख पाई माँ बाप से, कैसा है ये संस्कार
सोच ऐसी प्रदूषित हुई ,मन घट विष भरा अपार
अपने ही आराध्य पर प्रश्न चिन्ह, मन में दुर्भाव
पतन की है ये पराकाष्ठा, प्रदूषित हुआ विचार ॥
67
संतानों को संस्कार दें, चलें धर्म की राह पर
अपनी संस्कृति से रहें जुड़े, हर्षित न हों उपहास कर
धर्म विरुद्ध जो कृत्य करते, विधर्मी वे कहलाते हैं
नकारात्मक सोच है उनकी, चलें पतन की राह पर ॥
68
भ्रम में जीवन जीने वाले सदा भ्रमित ही रहते हैं
अपने को श्रेष्ठ मानते दूजे को निम्न समझते हैं
मिथ्या गुणों का गान करें, अहम में जीवन जीते
अहम की उनकी दुनिया है, अहम में वे जीते है ॥
69
जो प्रेम किसी को पीड़ा दे, वह प्रेम नहीं होता
जो सुख दुख न साथ निभाये, वह प्रेम नहीं होता
प्रेम तो आत्मसमर्पण है, हृदय का सच्चा साथी
प्रेम सदा दिल से जुड़ता, दिल से दूर नही होता ।
70
प्रेम होता दिल की धड़कन, देह तक ही संबंध नहीं
दिल में सदा प्रेम का बसेरा, प्रेम बिना संबंध नही
प्रेम तो है आत्मा का साथी, जीवन का है यह संगी
प्रेम हृदय की गहराई है, अमर - अनंत है प्रेम सही ॥
71
प्रेम के आँसू अमृत के होते, मोती बनकर बहते हैं
चाहे जितना उन्हें छिपाये, नयनों से आ टपकते हैं
प्रेम के आँसू आनंद के होते, ख़ुशियाँ वे जताते हैं
प्रेम ही जीवन होता है, प्रेम में आँसू आ टपकते हैं ॥
72
स्नेही को ढूंढता दिल, हर मोड़ पर हर राह पर
सुकून मिलता है दिल को, स्नेही संग बात कर
सच्चे प्रेम की खुशबू मिलती, सच्चे साथी संग
स्नेही तेरे बिन जीवन सूना, सूनी है मेरी डगर ॥
73
आशा मत कीजिए, दूजे करें आपसे प्यार
इसके बदले आप ही, करिये सबसे प्यार
यदि बाँटेंगे प्यार आप, दिल में आप बसेंगे
प्रेम में ही इतनी शक्ति ख़ुश हो घर संसार ॥
74
हर गली हर छोर पर स्वच्छता का दृश्य है
पेड़ पौधों की चमक धूल कणों से मुक्त है
प्रदूषण की क्या कहें शून्य इसकी माप है
इस धरा पर जीवों का इक सुरम्य वास है ।
75
सुबह की सैर स्वास्थ्य के लिये मुफ़ीद है
प्रकृति का सानिध्य हो, स्वर्ग की सी प्राप्ति है
शुद्ध वायु शुद्ध भोजन शुद्ध जल हमें चाहिए
इन घटकों के मेल से दीर्घ जीवन की प्राप्ति है।
76
शुद्ध वायु शुद्ध भोजन शुद्ध जल हमें चाहिए
पंचतत्व निर्मित तन को हर तत्व शुद्ध चाहिए
प्रदूषित कर रहे अपने ही भोज्य पदार्थ को
चिंतन का विषय ज़रूर चिंतन करना चाहिए ।
77
मनुज तन पाया व्यर्थ गँवाया चिपका है माया के पीछे
मोह जनित यह सृष्टि है छूट जायेगा इक दिन पीछे,
जब तक समय पास में तेरे, जप ले बंदे प्रभु का नाम
संचित कर्म ही हमराही बनेंगे प्रारब्ध होकर तेरे पीछे ॥
78
सितारों तुम ज़मीं आओ, बहुत ही प्यारे लगते हो
अपलक ताकता हूँ तुमको, इतने प्यारे लगते हो
ढूँढता हूँ स्वजन अपने, तुम्हीं में वे शायद कहीं होगे
टिमटिमाते हो ऐसे नभ में, स्वजन मेरे ही लगते हो ॥
79
कीचड़ जैसी है यह मृगतृष्णा मुझमें चिपकी रहती है
लाख छुड़ाता रगड़ रगड़ कर साफ नहीं यह होती है
कौन सा डिटर्जेंट इस पर डालूँ समझ नहीं मै पाता हूँ
बड़ी जटिल है यह मृगतृष्णा बड़ी धूर्त यह दिखती है ।
80
रक्त मांस की स्थूल काया में मृगतृष्णा क्या पाती हैं
क्या खाती है क्या पीती है इतनी शक्तिशाली होती है
वृद्धि दर इसकी बड़ी तेज है दिन रात चौगुनी बढ़ती है
प्रभु कृपा बिन यह न भागें बड़ी दुष्ट प्रवृत्ति की होती है ॥
81
अशांत मृगतृष्णा यह कभी तृप्त नही होती
प्रभु की शरण बिना कभी मुक्त नहीं होती
मन में रख अहम् भाव ईर्ष्या द्वेष की भावना
चाहत विरक्ति और वैराग्य पूर्ण नहीं होती ॥
82
कोई लेता सन्यास यहाँ कोई जाता है वन को
कोई कहता घर मधुबन है जगह जगह न भटको
बना लो घर को आश्रम जैसा पुनीत और सुंदर
घर ही शांति निकेतन है मिलता शांति मन को ॥
83
ये चंचल मन कुछ न समझे, मुझे उलझाए रहता है
एक जगह स्थिर नहीं होता, मुझे दौड़ाए रहता है
क्षण भर का पता नहीं वर्षों की योजना बनाता है
खुद उलझता रहता है मुझे भी उलझाये रहता है ॥
84
बचपन की यादें मुझे बुलाती,जहां पर खेला करता था
मिले गले अपने स्वजनों से, जिनकी गोद में खेला था
यह सब तो है अब मन की बातें, केवल सोचने तक की
कौन वहाँ अब मेरा बैठा है, जिनका दुलार मैं पाता था ॥
85
मन है मन का काम सोचना इस पर बल नहीं चलता है
कल्पनाओं की ये शक्ति, बिन पंख ही उड़ता रहता है
यदि होती न चिंतन की शक्ति ज्ञान विज्ञान कैसे होते
मानव ही ऐसा प्राणी है जो हर पल चिंतन में रहता है ॥
86
एक उम्र के बाद उस उम्र की बातें उम्र भर याद आती हैं
दुख इस बात का है वह उम्र फिर उम्र भर नहीं आती है
जीवन की इस गणित का यारों होता अजीब फ़लसफ़ा
दो कोष्ठक में बंद हम पर यह बात समझ नहीं आती है।
87
दिल की गहराइयों में कुछ यादें बसी रहती हैं
कोशिश करो भूलने की, पर वे नही भूलती हैं
यादें हैं यादों का क्या, यादें तो केवल यादें हैं
अवसर पाकर उभरती मन को झकोरती हैं॥
88
जीवन में कुछ अच्छा करना लीक से हटकर भी चल लेना
पथ में मिलेंगे अवरोध अनेकों बाधाओं से न विचलित होना
मानव जीवन न हो जाये निर्थक बड़े पुण्य से यह मिलता है
सत्कर्म और सेवा ही परम धर्म है इससे विमुख न होना ॥
89
अकर्मण्यता का जीवन जीकर, जीवन को व्यर्थ न गवाएं
जीवन में कुछ ऐसा करना, समाज तुम पर गर्वित हो जाए
सेवा धर्म ही परम धर्म है, सेवा का मार्ग जीवन में अपनाए
सुलभ सरल उत्तम यही मार्ग है, मानवता की सेवा कहलाए
90
हे चिड़िया तू तो बहुत है प्यारी मेरे आसपास तू डोल रही
चीं चीं चीं चीं तू करती है कानों में मेरे मधुर रस घोल रही
मानो कहती जग जाओ प्यारे रात बीत गयी और भोर हुई
वो नन्ही मुन्नी प्यारी चिड़िया तन मन में मेरे ऊर्जा भर रही ।
91
कथनी कुछ करनी अलग, अपनी ढपली है अपना राग
प्यासा पथिक जल माँगता बदले में हो अमृत की माँग
वैरागी ज्ञानी करते लंबी बातें पाखंड का चोला हैं पहने
ठग रहे जग को ये बहुरूपिये ठसक बनाये झूँठी स्वाँग ।
92
लिखना चाहता हूँ प्रेम गीत,पर शब्द नहीं मिलते
तपती धरती मरुस्थल में कभी फूल नही खिलते
भाव शून्य हो जाता हूँ, जब लिखने को आता हूँ
हृदय मेरा है कोरा काग़ज़,स्याह रंग नहीं सकते ॥
93
सोच मेरी छिछली है समन्दर से मोती चुन नहीं पाता
जमीं पर बैठ नभ से चाँद तारे तोड़ लाना नहीं आता
सूर्यचन्द्र निस्तेज लगता कवियों की उपमा के सामने
कितना करें उपमेय को उपमा में पिरोना नहीं आता ॥
94
कर्म भूमि की इस दुनिया में, श्रम सभी को करना है
भगवान तो सिर्फ लकीरें देता,,,,रंग हमें ही भरना है,
जैसा चाहो वैसा भर लो बंदे, रंग तूलिका तेरे हाथ है
कर्म भाग्य को बदल है देता, ऐसा संतों का कहना है ।
95
इंसान कोसता दैव को अपने कर्म को नही
कर्म ही प्रधान है गीता शास्त्र सिखाता यही
सत्कर्म बदल देते भाग्य विधि के विधान को
अटल हैं नभ में ध्रुव राज कर्म के प्रताप से ही ॥
96
पतझड़ बिना पेड़ का विकास नहीं होता
संघर्ष बिना जीवन में लक्ष्य प्राप्त नहीं होता
कठिनाइयों से जो लड़े धीर वीर कहलाये
परिश्रम ही सफलता का एक पैमाना होता ॥
97
धन है तो सब कुछ है,, यारो ऐसा नहीं होता
संतोष और सुकून न हो, तो सब व्यर्थ होता
दौलत से आराम मिलता है पर संतुष्टि नहीं
ऐसा होता, धनवान कभी अशांत नहीं होता ॥
98
लिखता रहता अपने विचार , आपको प्रेषित करता हूँ
आप ही मेरी करे समीक्षा कितना सही मैं लिखता हूँ
कोरे ज्ञान का अर्थ नहीं यदि आचरण उस पर न करें
कुछ अंश ही सही शुद्ध विचारों को अमल करता हूँ ॥
99
कितने मित्र बना रहा है कितने आगे बनायेगा
हृदय में विचार कर प्रभु को सच्चा मित्र पायेगा
लिप्त है तू विषयों में सच्चे मित्र को भूल गया
कृष्ण जैसा मित्र ही, भवसागर पार करायेगा ॥
100
यूँ पुरखों की ज़मीन बेचकर कभी न इतराया करो
उनके खून पसीने की पूंजी पे सम्मान जताया करो
कब छोड़ना पड़े शहर मुसीबत बता कर नहीं आती
दिल्ली की दुर्दशा देखकर गाँव में घर बनाया करो ॥
101
बाबा कहते नाती से ज़मीं पर बनाना इक मकान
फ़्लैट है पिंजरे जैसा, भविष्य भी होगा पिंजरे समान
छत पर छत ख़रीद रहे मेरी समझ में नहीं आता है
घुटन भरी लगती ज़िन्दगी, गाँव है मेरा स्वर्ग समान ॥
102
पैदल चलना आत्म विश्वास में मिथ्या दौड़ से बेहतर है
सागर की लहरें लौट जाती, चट्टान यदि स्थिर है
निर्मित करता भाग्य साहसी अपने पुरुषत्व के बल पर
दुर्गम पथ को सुगम बनाता सागर पर भी तैराता पत्थर है ।
103
कभी अंधा कभी गूँगा कभी बहरा बनना पड़ता है
रिश्ते तो रिश्ते हैं जैसे भी हैं उन्हें निभाना पड़ता है
उन रिश्तों में मिठास नही जिसमें है विश्वास नही
खिलवाड़ न करे रिश्तों से रिश्ता निभाना पड़ता है।
104
स्वार्थ की यह दुनिया है स्वार्थ का बोलबाला है
अपना काम कैसे निकले इसी में सोच सारा है
किसी काम के नही ऐसे बन्दे दूरी ही इनसे रखें
ये तो ऐसे लोग हैं मुख से निकालते निवाला है ।
105
रिश्तों में हो रही कमी, स्वार्थ रिश्तों पर भारी है
संस्कारों में हुई कमी, आज की यह दुश्वारी है
न चिंता सम्मान की, न है चिंता स्वाभिमान की
होड़ होड़ है लगी हुई, चहुँओर खूब मारामारी है ॥
106
लोग जरूरत के मुताबिक़ इस्तेमाल करते हैं
एक हम हैं भ्रम में थे सब मुझे पसंद करते है
भ्रम टूटा, सब छूट गया, सारे सपने टूट गये
सच्चाई यही अपने ही भीतरघात करते हैं ॥
107
वक्त से ज़्यादा ज़िन्दगी में अपना नहीं होता
वक्त से ज़्यादा ज़िन्दगी में पराया नहीं होता
जब वक्त अपना हो पराये अपने हो जाते हैं
अपने पराये हो जाते जब वक्त पराया होता ॥
108
राजनीति के चक्कर में आपसी संबंध न ख़राब करें
ये हैं चोर चोर मौसेरे भाई, छद्म रूप की पहचान करें
कोई भी दूध का धुला नहीं,भ्रष्टाचार में सब सने हुए
समझ बूझ कर वोट करें , सुपात्र का ही चयन करे ॥
109
जाति पाँति के चक्कर में, यारों वोट बंटने मत देना
वोट आपका बहुत क़ीमती व्यर्थ इसे मत जाने देना
फ़्री की कौड़ी बाटेंगे, ये आपसे ही वसूला जाता है
सौ दो सौ के चक्कर में , ईमान इन्हें बेच मत देना॥
110
दया धर्म से है बड़ा, सर्व धर्मों का मूल
क्रूरता अमानवीय है ,,देता केवल शूल
करते है जो क्रूरता होते राक्षस समान
दंड के ये पात्र हैं नष्ट करें इन्हें समूल ॥
111
ग्रंथों में सब ज्ञान भरा है जीवन जीने का सार भरा है
समय नही पर पढ़ने का लाइब्रेरी की ये शान चढ़ा है
कौन पढ़ें मोटी मोटी पुस्तक, कौन याद करें पहाड़ा
छ इंच की मोबाइल में, विश्व का आज ज्ञान भरा है ॥
112
पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, घर के कोने में पड़ी रहती हैं
प्रकाशन कराते वही लोग, विद्वता जिन्हें दिखानी होती है
बदल गया ज़माना है, सोशल नेटवर्किंग का तक़ाज़ा है
बहना चाहिए उसी धारा में, जिस दिशा में धारा बहती है ॥
113
सूखे कुछ मोर के पंखी पाया एक दिन इक पुस्तक में
ध्यान गया तब बचपन में मेरा रखते थे इनको पन्नों में
धारणा रहती विद्या देवी आयेगी पाठ याद करवायेगी
बचपन की सब ये बातें है शेष बची कुछ स्मृतियों में ॥
114
बच्चे होते बहुत ही कोमल मन से होते चंचल हैं
पर लालन पालन हुआ कठिन नैनी पर निर्भर हैं
पति पत्नी नौकरी करते, बच्चे उनसे दूर ही रहते
कैसे मिले संस्कार, माँ बाप का प्यार दुष्कर है ।
115
लगता जब आघात उर में छलक उठती वेदना
अश्रुपूरित नयन होते पर चाह रहती अश्रु थमना
कंठ मध्य स्वर फंस गया शब्द वे निस्तब्ध रहे
बज उठी सुर में मानो विद्युत तारों की झनझना ।
116
असीम वेदना हृ्दय संतप्त मन क्षुब्ध सा अनमना
बीत जाती है निशा घूरकर नीरवता की सनसना
धूल धूसरित हुए सपने कल्पनायें सब आहत हुई
ढाँप ली सूर्य रश्मियों को मानो मेघों की गर्जना ।
117
मिथ्या भ्रम मत पालो धरातल पर रहना उत्तम है
सलाहकार बहुत मिलते हैं सभी मतलबी होते हैं
घर फूंक देते दूसरे का तब भी संतुष्ट नहीं होते हैं
ऐन केन प्रकारेण रिश्तों में खटास पैदा करते हैं ।
118
सत्य बोध है परम लक्ष्य,,,,,जीवन का उद्देश्य यही
देव दुर्लभ मानव तन पाकर,व्यर्थ करना ठीक नही
सत्य मार्ग पर चला है जो, सत्यनिष्ठ वह कहलाया
अड़चनें हैं पग पग पर, जीवन की है यही राह सही ॥
119
सत्य पथ पर गौतम चले भगवान बुद्ध कहलाए
सत्य पथ पर हरिश्चंद्र रहे, सत्यवादी कहलाए
मिलेगी अड़चनें, होगी परीक्षाएं, अडिग रहना है
सत्य पथ जो रहा डिगा, दुख प्रतिज्ञ माना जाए॥
120
सब धर्म अच्छे होते हैं सबका अपना अपना गुण गान है
दया, करुणा, परोपकार, सेवा अच्छे धर्म का आधार है
धर्म विरुद्ध जो कृत्य करता अपनों से ही वो छल करता
कैसे कहलाये वो धार्मिक वो तो नर नही नर पिशाच है ।
121
धर्म विरुद्ध कृत्य जो करते हैं विधर्मी वे कहलाते हैं
भटकते रहते हैं आजीवन कुमार्ग पर वे चलते हैं
अश्वस्थामा चला विधर्म की राह वन वन भटक रहा
कृष्ण शापित ब्राह्मण भाल से आज भी रक्त रिसते हैं ।
122
धर्म के नाम पर धोखा देते बच्चों को उकसाते हैं
भरते मन में कुत्सित भाव धार्मिक कट्टरता बढ़ाते हैं
आगे चलकर ऐसे बच्चे जघन्य पाप कृत्य करते
समाज के लिए नासूर बनते खून की नदियां बहाते हैं ।
123
जरा बताये सोच कर यारों बात ये कितनी है सच्ची
कितना बड़ा पेट है मानव का जो करता माथापच्ची
तन की यह बात नहीं है, सारा झगड़ा तो मन का है
मन का पेट नहीं भरता है, करता रहता माथापच्ची ॥
124
तन मात्र दो रोटी माँगता, षडरस् व्यंजन का खेप नही
तन दो कपड़ों में राजी है,पर मन कपड़ों के ढेर में नही
नींद आने पर तन को, पत्थर से भी होता परहेज नहीं
मखमली बेड मन को चाहिए, मन का भरता पेट नही ॥
125
तन दो रोटी खाकर कहता, छोड़ो अब कुछ नहीं चाहिए
मन कहता है,नहीं नहीं, अभी तो मुझे कुछ और चाहिए
शुगर भरा है तन में सारा मन कहता, कुछ मीठा खा लो
इंसुलिन पेट में ले लेगें मीठा तो अमृत है खाना चाहिए