क्या वास्तव में जमाना बदल गया है लेख

रोज़ तारीख बदलती है,

रोज़ दिन बदलते हैं

रोज़ अपनी उमर भी बदलती है,

रोज़ समय का रंग बदलता है।

हमारे नज़रिये भी

वक्त के साथ बदलते हैं

बस एक ही चीज़ है

जो नहीं बदलती

और वो हैं हम खुद।

यही वजह है कि हमें लगता है

कि अब ज़माना बदल गया है।

हर इच्छा पूरी हो,

ये ज़रूरी तो नहीं।

कुछ इच्छाएँ शेष भी रहनी चाहिए,

जीने का असली मज़ा

इन्हीं अधूरी ख्वाहिशों में है।

क्यों ढूँढ रहा है आसमान?

ज़मीन पर चल कर भी देख,

वहीं जीवन का असली रस है।

हम भी यहीं हैं, तुम भी यहीं हो,

अपनी-अपनी दोस्ती हम निभाएँगे।

मिलकर मुस्कुराएँगे

कितना सुंदर लगेगा

ज़िन्दगी का ये सफ़र,

बस साथ चल कर तो देख।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है

रहने दे आसमाँ, ज़मीन की तलाश कर,

सब कुछ यहीं है, कहीं और न तलाश कर।

हर आरज़ू पूरी हो, तो जीने का क्या मज़ा,

जीने के लिए बस एक खूबसूरत वजह की तलाश कर।


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