मन व्यथित है,
चल रहा भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द्व,
आखिर क्या है जीवन का उद्देश्य?
केवल वस्त्र, भोजन या आवास,
या हवाई यात्रा, मौज मस्ती,
सब कुछ तो ये अस्थायी है,
केवल छलावा है , अचानक छिन जाता है एक दिन,
जीवन भर की पूंजी अस्पताल में चली जाती है,
पर फिर भी हाथ कुछ नहीं आता,
जरूरत ही क्या है संग्रह की ?
कौन सा ख़ज़ाना लेकर हम आये थे
और क्या लेकर जायेगे ,
इन्हीं उलझनों के बीच में
सारा जीवन खप जीता है
शेष रहता केवल शून्य
यही हैं मेरे मन का अन्तर्द्वन्द्व,
लोग कहते हैं मैं सोचता जाता हूँ
क्या करें झूठ का जीवन रास आता नही ।
तो जीवन सत्य क्या ?
एक अनवरत यात्रा, जन्म मृत्यु का चक्र,
चला आ रहा अनंत काल से,
चलता रहेगा ऐसे ही
विभिन्न योनियों में जीवन का ये खेल ।
क्यों करता मानव पाप?
पेट के लिए, धन वैभव के लिए,
भौतिक सुखों के लिए,, कौन रहा जीवित
सुख भोगा और मृत्युंजयी बना?
विस्मृत नहीं हुआ अभी कोरोना का वीभत्स रूप,
वृद्ध रहे हो, या नौजवान,
काल के हुये हैं सभी शिकार।
तड़पते रहे , चिल्लाते रहे ,
अपने भी साथ न रहे,
कइयों को तो चार कंधे भी नहीं मिले,
फेंक दिये गये कूड़े के समान यत्र तत्र,
आती रहती हैं ऐसी त्रासदियाँ
जब मानव स्वयं को स्वयंभू समझने लगता है,
प्रकृति समझा देती है क़ायदे से,
बता देती है मानव की औकात ।
कितना भी अनुसंधान कर लो
नहीं समझ पाओगे ,,
सच्चाई है केवल शून्य, ख़ाली हाथ,
पंचतत्व निर्मित शरीर, पंचतत्व में मिलेगा ॥