उतरे भीतर साँस की छोर,
सार तत्व को ले हम निचोड़।
प्रश्न उठता है – भीतर क्या है?
भीतर भला हम क्यों उतरें?
क्या लाभ है, क्या हानि है,
कैसे जाने भीतर बिन उतरे?
बाहर बाहर देख रहे हैं,
बाहर की दुनिया चमकीली।
इसी चमक में दुनिया पागल,
भ्रमित घूम रहे गली–गली।
जीवन मोती यदि चुनना है,
लगाएँ गहरी डुबकी ज़ोर।
उतरें भीतर साँस की छोर,
सार तत्व को ले हम निचोड़।
भीतर ही सब कुछ होता है,
भीतर ही आनन्द मिलता है।
भीतर ही नफरत पनपता,
भीतर ही प्रायश्चित होता है।
भीतर ही दुख का डेरा है,
भीतर ही सुख का भंडार।
भीतर ही ईश्वर रहता है,
भीतर से खुलता मुक्ति द्वार।
एक ही राह सही लगती है,
क्यों न चलें भीतर की ओर।
उतरें भीतर साँस की छोर,
सार तत्व को ले हम निचोड़।
साँसों के भीतर ही तो,
जीवन का भेद छिपा है।
जिसने साँसों को नापा है,
उसने प्रेम पीयूष पिया है।
साँसें जगती हैं तो जीवन है,
साँसें सोती हैं तो मृत्यु।
साँस–साँस चंदन बन जाए,
जीवन को महका जाए।
आत्म शांति तभी मिलती है,
जब झाँके हम भीतर की ओर।
उतरें भीतर साँस की छोर,
सार तत्व को ले हम निचोड़।