जीवन का यथार्थ
जीव तो पराधीन होता है, ईश्वर के समान स्वतंत्र नही, काल चक्र के पहिये में एक दिन विलुप्त हो जाता है ।समस्त संग्रहों का अंत विनाश है, लौकिक उन्नतियों का अंत भी है पतन, वृक्ष के पके हुये फल का पतन ही तो अंततः होता है । संयोग का अंत वियोग है,जीवन का अंत मरण … Read more