पुरानी यादें हैं यादो का क्या भाग सात

पुरानी यादों की सातवीं श्रृंखला में

चर्चा घर आये पाहुन की आज हम करते हैं

पुरानी यादें साझा करते हैं

अतिथि घर में आते थे

“अतिथि देवोभव “ का आदर पाते थे

ख़ूब आदर सत्कार किया जाता था

देव तुल्य उन्हें समझा जाता था

परिवार के सदस्य समान वे रहते थे

घुलमिल कर वे रहते थे

संयुक्त परिवार का वह ज़माना था

आना जाना रोज का फसाना था

एक दूसरे के यहाँ आते जाते रहते थे

प्यार से मिलते जुलते रहते थे

शादी ब्याह त्योहारों में इकट्ठे सब हो जाते थे

जमकर साथ में लुत्फ़ उठाते थे ।

पुराने यादें है यादो का क्या..

इसके विपरीत कुछ ऐसे भी पाहुन होते थे

जो घर के अकर्मण्य कहलाते थे

हाथ पैर वे नहीं चलाते थे

बैठ कर पसेरी भर भोजन करते थे

घर से जब उन्हें भगाया जाता था

रिश्तेदारों के यहाँ शरण तब वे लेते थे

उनका अपना रुतबा था

आने जाने का हिसाब बखूबी रखते थे

बारी बारी से पाहुन वे बनते थे

महीनों रिश्तेदारों के यहाँ डटे वे रहते थे

पर्दा प्रथा का वह ज़माना था

घर की बहुयें घूँघट में रहती थी

सामने नहीं निकल सकती थी

अंदर अंदर सब सिसकती रहती थी

पर सामने कुछ नहीं कह सकती थी

“अतिथि देवोभव “ का अनुसरण वे करती थी ।

पुराने यादें है यादो का क्या..

ऐसे निठल्ले जब आ टपकते थे

मानो घर में वज्रपात गिर जाता था

अपने घर के तो वे भारू थे

पर बाहर तो उनका अतिथि का जलवा था

शांति से पाहुनी नहीं कराते थे

हर चीज़ पर आपत्ति वे करते थे

अपनी पसंद सामने धरते थे

बिन माँगे सलाह वे देते थे

हर बात पर टांग अड़ाते थे

दूध, दही और घी पर वे टिकते थे

सूखे भोजन नहीं वे करते थे

दाल में देशी घी का छौंका मारा जाता था

दूध का बड़ा गिलास पिलाया जाता था

मुलायम गद्दा बिछता था

खटमल जैसे वे चिपके रहते थे

शान से पान की गिलौरी चबाते थे

अपनी शाही हनक दिखाते थे

दो एक कपड़े ही वे धारण करते थे

पर बुर्राक सफ़ेदी पहनते थे

कितने दिनों का पाहुन बनना है

कभी अपना भेद नहीं बताते थे

जब तक व्यवस्था उत्तम रहती थी

मौज से अतिथि सत्कार कराते थे

फिर आगे को प्रस्थान कर जाते थे ।

पुराने यादें है यादो का क्या..

अकर्मण्यों की ज़िंदगी ऐसी ही होती है

दो रोटी के लिये मान गँवाते हैं

ऐसे व्यक्ति घर के निठल्ले होते हैं

स्वागत सत्कार कहीं नहीं पाते हैं

दर दर दुत्कारें जाते हैं

पर हाथ पाँव नहीं चलाते हैं

पहले भी निठल्ले होते थे

आज भी निठल्ले मिलते हैं

पर अब बदला हुआ ज़माना है

“अतिथि देवोभव “ सूत्र हुआ पुराना है

अब तो ह्वाटसैप, फेसबुक की महिमा है

इसी पर फ़्रेंड बनाते हैं

रिश्ते नातों से दूर सब रहते हैं

ख़ूब फालो करते और कराते हैं

और परम आत्म संतुष्टि पाते हैं

“ह्वाटसैप देवोभव” की संज्ञा

आज हम देते हैं ।

पुराने यादें है यादो का क्या..

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