चलो चलें हम गांव की ओर

इस शहर की आपाधापी से

चल निकल चलें हम गांव की ओर ।

पड़ोसी भी नहीं पूछता

भाई तुम कैसे हो,

मशीनरी जीवन हम जीते हैं

देर रात थक कर घर आते हो ।

सुकून की दो रोटी दुर्लभ

बच्चे भी मिलने के पहले सो जाते हैं

चलो चलें हम गांव की ओर

जहाँ बचपन में हम खेले थे

जहाँ सभी अपने जैसे थे

इस शहर की आपाधापी से

चलो निकल चलें हम गाँव की ओर ।

लगता मन बोझिल नीरस

दो कमरों में बंद हम रहते है,

यार दोस्त अब नहीं मिलते हैं

एकल जीवन काटते हैं ।

हर चेहरों को मैं पढ़ता हूँ

दिखता केवल ही तनाव,

खुद से परेशान है मानव

खुलकर जीने का नहीं दिखता चाव,

इससे तो गांव में अच्छे थे

कच्चे घर में हम रहते थे

वो बरगद की छांव तले

दुपहरिया में झपकी लेते थे

इस शहर की आपाधापी से

चल निकल चलें हम गांव की ओर ।

जहां ईद दिवाली साथ साथ

गलबांह डाल कर मिलते हैं,

ईद दिवाली की मन्नत

सब संग मिलकर करते हैं,

निश्छल मन के सब धनी जहाँ

जहाँ पर माँ गंगा बहती है

सुख दुख बांटते साथ साथ

हिल मिल कर सब रहते हैं

जब फसल कटकर आती घर में

दिल खोल त्योहार मनाते हैं,

मन यहाँ पर नहीं रमता है

गांव गांव ही ये करता है

इस शहर की आपाधापी से

चल निकल चलें हम गांव की ओर ।

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