बूढ़ी माँ का दर्द

बूढ़ी माँ का दर्द

कभी माँ के पास बैठकर पूछो

बस इतना ही कहना,

“थक गई हो क्या?” 🌷

रात के ग्यारह बजे थे,

सन्नाटा था, घर सोया था,

बस रसोई से छन–छन की ध्वनि,

कुछ कहती-सी, कुछ रोया था।

कब सोती है, कब जगती है,

किसी को नहीं है भान,

दिन भर झाड़ू–पोछा करती,

मशीन है या है इंसान?

नींद नहीं थी आँखों में,

जलते थे प्रश्न हज़ार,

क्यों सबके लिए जगती हूँ मैं,

कौन मेरे लिए रखे प्यार?

सुबह हुई, सब सोए रहे,

वो फिर झाड़ू थामे खड़ी,

चाय, टिफ़िन, कपड़ों की दौड़,

फिर वही दिनचर्या पड़ी।

शाम ढली, बच्चे लौटे,

वो फिर भागी रसोई में,

कहना चाही “मैं भी थक गई”,

पर शब्द मरे थे होठों में।

इस घर में उसे थकने का,

अधिकार कहाँ से मिला?

वो तो बस सांसों की मशीन थी,

जो रोज़ सुबह फिर से चला।

रात गहराई, सब सो गए,

वो रसोई में रह गई,

गैस बुझाई, सिंक चमकाया,

सुबह की चिंता में रैन ढली।

सिर चकराया, दीवार पकड़ी,

और नींद में डूब गई,

कब चली गई कौन जाने,

बस शांति पीछे छोड़ गई।

कुछ कह न सकी, बुला न सकी,

निकल पड़ी वो अकेली,

शांत, स्थिर, चुपचाप

थकान की मूर्ति, वो ममता झेली।

जब कोई आवाज़ न आई,

बस सन्नाटा बोल उठा,

रसोई के बर्तन रोने लगे,

उसके दर्द में तड़प उठा।

दिन गुज़रे, पर मन न भरा,

बेटे को एक डायरी मिली,

ऊपर लिखा था “मेरा मौन”,

पन्नों में उसकी दुनिया छिपी।

“बुखार है फिर भी काम करूँ

रुक जाऊँ तो घर रुक जाएगा

कोई नहीं पूछता कैसी हूँ,

मेरा अस्तित्व कहाँ मिट जाएगा?”

“ मुझे डर है, एक दिन गिर जाऊँगी,

और कोई जान नहीं पाएगा,

शायद तब सब समझेंगे घर दीवारों से नहीं,

एक औरत की साँसों से चलता है”

दिल में पश्चाताप था गहरा,

अब समझा बेटा अर्थ जीवन का,

नारी का मौन कितना गहरा,

कितना पवित्र, कितना दैवीय, कितना ठहरा।

कभी माँ के पास बैठकर पूछो

बस इतना ही कहना,

“थक गई हो क्या?”

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