आज के रिश्ते

पहले रिश्ते मन से जुड़े, अब मतलब से बँध जाते हैं,

आत्मीयता की ऊष्मा खोकर, शब्द ही शेष रह जाते हैं।

बड़ों की डाँट में स्नेह छुपा, अनुभव का था उजियारा,

आज जवाब में उत्तर नहीं, बस अहंकार का गुब्बारा।

जो बच्चे पलट कर बोल रहे, दोष उनका क्या माना जाए,

जब माँ-बाप स्वयं आदर खो दें, संस्कार कहाँ से आए?

धन ने रिश्तों को तौला है, ममता पीछे छूट गई,

जिसकी मुट्ठी भरी हुई है, वही राह सही लूट गई।

कमज़ोर किनारे कर दिए गए, ऊँच-नीच का खेल चला,

घर अब मंदिर नहीं रहा, बस हैसियत का मेल चला।

कोई किसी की सुनता नहीं, सब खुद को ही ज्ञानी समझें,

सच बोले जो आईना बन, उसे मूर्ख अज्ञानी समझें।

ईर्ष्या-द्वेष की धूप जली, स्नेह की छाया जलने लगी,

अपने ही अपने से रूठे, रिश्तों की डोर गलने लगी।

पर यहीं चाहिए समझदारी, यहीं धैर्य का दीप जले,

रिश्ते टूटें उससे पहले, संवाद की लौ न बुझने दे।

चार दिन का यह जीवन है, क्यों कलह का बोझ उठाएँ,

थोड़ा झुक जाएँ हम सब, तो टूटे रिश्ते जुड़ जाएँ।

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