विरह गीत

लिखना आये या न आये मैं भी अब एक गीत लिखूँगा

प्रेम गीत लिखना ना जानूँ मैं एक विरह गीत लिखूँगा ॥

वैरागी ठहरे भोले बाबा पर सती के संग वे बदल गये

औघड दानी मेरे शिव शंकर जी सती के हम सफ़र हुये

सती भस्म की दिव्य कथा शिव जी का वैराग्य लिखूँगा

हृदय धधकती ज्वाला को समाधिस्थ हो शांत करूँगा ॥

प्रेम ही दर्शन प्रेम ही पूजा प्रेम पर वैराग्य गीत लिखूँगा

हृदय के सूने मर्मस्थल पर अलौकिक प्रेम गीत लिखूँगा॥

रात-दिन सोते-जागते गोपियाँ कान्हा कान्हा रटती हैं

न रहती सुध बुध तन की न मर्यादा का पालन करती हैं

मन की इच्छा मन में दब गयी विरह पीड़ा जता न सकी

गोपियों के अनन्य प्रेम बिछुड़न पर विरह गीत लिखूँगा ॥

इक निर्मोही से प्रेम हो गया जो राग रंग से आगे का है

ऐसी प्रीति जुड़ी है उससे विरह व्यथा में गीत लिखूँगा ॥

वैरागी को रूखा मत समझो होता वह इक रसिक प्रेमी

प्रेम स्नेह, प्रेम विह्वल, सर्व त्यागी और सर्व कुशल क्षेमी

चातक पपीहे जैसे जीवन जीता टकटकी प्रेमी पर रखता

प्रेम विरह में पीड़ित मन का पूरा पूरा मैं वृतांत लिखूँगा ॥

जीवन में धधकती तृष्णा को अमृत रस से शांत करूँगा

ज्ञान की ज्योति जलाकर जीवन में नव प्रकाश भरूँगा ॥

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