रे मन प्रभु भक्ति में तू रम जा

रे मन ! प्रभु भक्ति में रम जा

शरण प्रभु का तू गह ले ..2

आँख मूँद ले ध्यान लगा ले

सोच जरा परीक्षित जैसे

समय सीमा तेरी निश्चित है

काल खड़ा है द्वार पर तेरे

शेष जीवन जो तेरे हाथ में

मानव जीवन सार्थक कर ले

हाथ कहीं मलता न रह जा

शरण प्रभु का तू गह ले ।

रे मन ! प्रभु भक्ति में रम जा

शरण प्रभु का तू गह ले ..2

भगवद् संकीर्तन में रम जा

वैराग्य मय जीवन जी ले

कर किनारा सासांरिक विषयों से

अर्पण कर दे जीवन प्रभु को

क्या तेरा है क्या मेरा है

“ मैं” का कोई स्थान न हो

राजा परीक्षित जैसा बन जा

शरण प्रभु का तू गह ले ।

रे मन ! प्रभु भक्ति में रम जा

शरण प्रभु का तू गह ले ..2

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.