“लगता है उत्तरार्द्ध आ गया”
“तन की शक्ति क्षीण हो रही”
लगता है उत्तरार्द्ध आ गया,
तन की शक्ति क्षीण हो रही।
साँस तो चलती है लेकिन,
धीमे-धीमे थम सी रही।।
घुटनों में अब दर्द ठहरता,
नेत्रों का तेज़ गया कहीं।
चलते-चलते ठहर सा जाता,
थक जाता हूँ यहीं कहीं।।
सोचता हूँ बैठ जाऊँ पलभर,
फिर डरता यह आदत न बन जाए कहीं।।
लगता है उत्तरार्द्ध आ गया,
तन की शक्ति क्षीण हो रही।।
याद नहीं अब पहले जैसी,
कहाँ रखा चश्मा भूल गया।
ढूँढते-ढूँढते पास मिला वो,
फिर हँसकर खुद से बोल गया।।
कहाँ गई वो तेज़ी मन की,
कहाँ गया वो जोश गया।।
दोस्त बुलाएँ, मन बहलाएँ,
पर अब उतना मन न रहे।
पहले जो उड़ते थे पंछी,
अब आकाश भी दूर लगे।।
हर चीज़ वही, पर भाव नहीं
मन भीतर कुछ मौन कहे।।
वैराग्य मय हो चला ये जीवन,
जग सब मिथ्या-सा लगता है।
भाग-दौड़ में बीते दिन सब,
अब बस आत्मा जगता है।।
मानव जन्म मिला प्रभु से,
पर सार्थक कर न सका ये मन।।
पहले कोई कुछ कह देता था,
तब तर्कों की ज्वाला जलती थी।
अब कुछ भी कहो, बस चुप हूँ,
यह चुप्पी भी कितनी गहरी सी।।
शब्द नहीं, बस शांति रह गई,
यह भी तो प्रभु की देन सही।।
हाँ, अब कविता ही साथी है,
मन की सखी बन जाती है।
जो कहना चाहूँ कह लेती है,
जो सुनना चाहूँ सुन जाती है।।
किसी ने पढ़ा, मुस्काया होगा
यही सोच मन हरषाता है।।
लगता है उत्तरार्द्ध आ गया
तन की शक्ति क्षीण हो रही
फिर भी मन के भीतर कहीं
कविता की लौ जीवित रही।।