सूर्य देव और धरा

कौन-सी है भला प्रीत तेरी,

रंग-रंगीली रीत तेरी।

धरा से मिलन की चाह में,

बंधी है जैसे प्रेम डोरी॥

भोर होते ही उदय हो जाते,

लालिमा बिखेर धरा को सजाते।

गगन से उतर चूमते क्षितिज,

सुनहरी करतीं रश्मियाँ धरित्री को॥

श्रृंगारी हो जाती ये धरती,

तेरी किरणों की सौर साड़ी ओढ़ी,

पिया-मिलन को आतुर जैसी,

गाँव की गोरी, शर्मीली, जोड़ी॥

कौन-सी है भला प्रीत तेरी,

रंग-रंगीली रीत तेरी।

धरा से मिलन की चाह में,

बंधी है जैसे प्रेम डोरी॥

जब मेघों का आगमन होता,

इन्द्रधनुषी छटा बिखर जाती।

कभी छिपते, कभी झाँकते,

काली घटा संग आँख-मिचौनी करते॥

तप्त हुई जब धरती सारी,

तेरी तीक्ष्ण रश्मियों की लहरों से।

तब मेघ बन बरस पड़ते,

तोड़ मर्यादा प्रेम की डोरी से॥

कौन-सी है भला प्रीत तेरी,

रंग-रंगीली रीत तेरी।

धरा से मिलन की चाह में,

बंधी है जैसे प्रेम डोरी॥

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