सितारों तुम जमीं आओ

सितारों तुम ज़मीं आओ, दूर से ही चमकते हो

निर्निमेष निहारता हूँ बहुत प्रिय तुम लगते हो।

ढूँढता हूँ स्वजन अपने, तुममें ही वे कहीं होंगे

छिपाओ न तुम उनको, वे भी तो व्यथित होंगे

कहाँ पर लोग जाते हैं निशाँ कोई नहीं दिखता

झिलमिलाते हो तुम ऐसे, स्वजन मेरे लगते हो ।

जीवन ये तो नश्वर है, सभी आते सभी जाते

पर अपनी मधुर स्मृतियाँ वे यहीं पर छोड़ जाते

हृदय में है कसक छिपी झलक एक पाने की

तुम्हीं लगते स्वजन मेरे रात में टिमटिमाते हो ।

कहाँ खोजूँ किधर जाऊँ आस तुम पर ही टिकती

मन अस्थिर जब होता है नज़र तुम पर ही टिकती

हे तारा गण ! तुम भी निशा गत हो जाते मलीन

कैसे कहूँ भला जमीं आओ रात में ही चमकते हो ।

सितारों तुम ज़मीं आओ, दूर से ही चमकते हो

निर्निमेष निहारता हूँ बहुत प्रिय मुझे लगते हो।

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